Thursday, October 24, 2013

मजबूर हैं हम, हमारी खामोशी को कौन समझे?

पिछले दिनों महीनों बाद गांव से एक पुराने साथी लखन का फोन आया। हाल बेहाल था, उसकी सांसें पांच माह के बच्चे की तरह तेज चल रही थी। उसकी हांफती आवाज और तेज सांसों से साफ पता चल रहा था कि कि वह किसी बड़े महासंग्राम मे कूदा पड़ा है। किसी तरह गिर-भाग कर अपनी सलामती की खबर मुझे सुनाते हुए हंसे जा रहा था। मैं आश्चर्यचकित था कि रोते हुए भी हंस रहा है बंदा, आखिर बात क्या है? घर उजड़ चुका था, फिर भी पागलों की तरह हंसे जा रहा। हंसे भी तो क्यों न, आखिर बात उसकी जान बच जाने की थी। उसकी लंबी आप बीती सुनने के बाद पता चला कि गांव मे हाथियों ने कोहराम मचा रखा है। क्यों, मालूम नहीं। आखिर हो क्या रहा हमारे देश, समाज में? नजरें जिधर घुमाओ तबाही जारी है। कब तक चलेगी ? मालूम नहीं। किस हद तक होगी ? मालूम नहीं। इसमें अपने भी शामिल होंगे ? कहा नहीं जा सकता। पहाड़, जंगल सब बेच कर खा रहे ये 110ईमानदार नेता, अफसर और कुदरत का कहर झेले उत्तराखण्ड, झारखण्ड और पूरे देश के गरीब लोग। जिसे गरीबी का मतलब मालूम नहीं, वो एक गरीब देश को कैसे चला सकता है ?  परिणाम सबके सामने है। कौन कहता है गरीबी मिट गई हिन्दुस्तान से, कभी महलों से झांक कर देखो तो। चांद के पार चलो के तर्ज पर बेशर्मी की हद के पार चलो पर जैसे कुछ हरामखोर नेता-मंत्रीयों में बयानबाजी का मुकाबला छिड़ी है। तभी तो भारत माता के वीर जवान शहीद होते और ये कहते जवान तो शहीद होने के लिए होते ही। मां कसम अगर भारत-पाक युद्ध की घोषणा हुई तो पाकिस्तान छोड़ पहले इन्हीं कुत्तों के घर जाउंगा सर काटने, आर या पार। खैर ये तो रहा पूरे देशवासियों का दर्द, मामला हमारे गांव में हाथियों के कहर का है। लगभग 15 के झुंड मे आए हाथियों की मांग थी कि उनका जंगल कहां है ? समझाने की बहुत कोशिश की, कि हमारी कोई गलती नहीं, ये सब कोयला मंत्रालय और जंगल विभाग वालों के कारनामे... अपनी पूरी बात कह पाता उससे पहले एक-एक झटके मे कई घरों के नक्शे बदल गए हाथी महाराज ने। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता या उन्हें समझा पाता, हाथियों के सरदार आंखों मे आंखें डाल कह गए फिर मिलेंगे। अगले शाम रात का भोजन कर ही रहा था कि हाथियों के दोबारा आगमन की खबर कानों तक पहुंची। हैरान हूं यह सोचकर कि आज जहां इंसान अपने कहे को पूरा नहीं कर पाता वहीं हाथियों ने कर दिखाया। शायद उन्हें उनके सवालों का जवाब गले से नहीं उतर पा रहा था। तभी तो दोबारा गांव पहुंच घरों के नक्शे बदलने के बाद भी उसे जमीन में मिला देना ही बेहतर समझे। फिर क्या था पलक झपकते ही कई घरों को मिट्टी में मिलते देर नहीं लगी। किस्मत वाले रहे गांववाले जो इस बार हाथी गलती से कहना भूल गए कि फिर मिलेंगे। आखिर कौन है जिम्मेवार इन मासूमों की बर्बादी का ? दिल में एक  कस्मकस रह गया- काश उन 110% ईमानदार नेताओं का पता दे पाता हाथियों को। खैर जो भी हो गरीब लोग है, हिम्मत है मुसीबतों से लड़ने की। बस दुआ है भगवान हिम्मत दे फिर तो हंसते –गाते भी चल पड़ेंगे जंगलों के रास्ते भी।।