पिछले दिनों महीनों बाद गांव से एक पुराने साथी लखन का फोन आया। हाल बेहाल था, उसकी सांसें पांच माह के बच्चे की तरह तेज चल रही थी। उसकी हांफती आवाज और तेज सांसों से साफ पता चल रहा था कि कि वह किसी बड़े महासंग्राम मे कूदा पड़ा है। किसी तरह गिर-भाग कर अपनी सलामती की खबर मुझे सुनाते हुए हंसे जा रहा था। मैं आश्चर्यचकित था कि रोते हुए भी हंस रहा है बंदा, आखिर बात क्या है? घर उजड़ चुका था, फिर भी पागलों की तरह हंसे जा रहा। हंसे भी तो क्यों न, आखिर बात उसकी जान बच जाने की थी। उसकी लंबी आप बीती सुनने के बाद पता चला कि गांव मे हाथियों ने कोहराम मचा रखा है। क्यों, मालूम नहीं। आखिर हो क्या रहा हमारे देश, समाज में? नजरें जिधर घुमाओ तबाही जारी है। कब तक चलेगी ? मालूम नहीं। किस हद तक होगी ? मालूम नहीं। इसमें अपने भी शामिल होंगे ? कहा नहीं जा सकता। पहाड़, जंगल सब बेच कर खा रहे ये 110% ईमानदार नेता, अफसर और कुदरत का कहर झेले उत्तराखण्ड, झारखण्ड और पूरे देश के गरीब लोग। जिसे गरीबी का मतलब मालूम नहीं, वो एक गरीब देश को कैसे चला सकता है ? परिणाम सबके सामने है। कौन कहता है गरीबी मिट गई
हिन्दुस्तान से, कभी महलों से झांक कर देखो तो। चांद के पार चलो के तर्ज पर
बेशर्मी की हद के पार चलो पर जैसे कुछ हरामखोर नेता-मंत्रीयों में बयानबाजी का
मुकाबला छिड़ी है। तभी तो भारत माता के वीर जवान शहीद होते और ये कहते जवान तो
शहीद होने के लिए होते ही। मां कसम अगर भारत-पाक युद्ध की घोषणा हुई तो पाकिस्तान
छोड़ पहले इन्हीं कुत्तों के घर जाउंगा सर काटने, आर या पार। खैर ये तो रहा पूरे
देशवासियों का दर्द, मामला हमारे गांव में हाथियों के कहर का है। लगभग 15 के झुंड
मे आए हाथियों की मांग थी कि उनका जंगल कहां है ? समझाने की बहुत कोशिश की, कि हमारी कोई गलती
नहीं, ये सब कोयला मंत्रालय और जंगल विभाग वालों के कारनामे... अपनी पूरी बात कह
पाता उससे पहले एक-एक झटके मे कई घरों के नक्शे बदल गए हाथी महाराज ने। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता या उन्हें समझा पाता, हाथियों के सरदार आंखों मे
आंखें डाल कह गए फिर मिलेंगे। अगले शाम रात का भोजन कर ही रहा था कि हाथियों के
दोबारा आगमन की खबर कानों तक पहुंची। हैरान हूं यह
सोचकर कि आज जहां इंसान अपने कहे को पूरा नहीं कर पाता वहीं हाथियों ने कर दिखाया। शायद
उन्हें उनके सवालों का जवाब गले से नहीं उतर पा रहा था। तभी तो दोबारा गांव पहुंच
घरों के नक्शे बदलने के बाद भी उसे जमीन में मिला देना ही बेहतर समझे। फिर क्या था
पलक झपकते ही कई घरों को मिट्टी में मिलते देर नहीं लगी। किस्मत वाले रहे गांववाले
जो इस बार हाथी गलती से कहना भूल गए कि फिर मिलेंगे। आखिर कौन है
जिम्मेवार इन मासूमों की बर्बादी का ? दिल में एक कस्मकस
रह गया- काश उन 110% ईमानदार नेताओं का पता
दे पाता हाथियों को। खैर जो भी हो
गरीब लोग है, हिम्मत है मुसीबतों से लड़ने की। बस दुआ है भगवान हिम्मत दे फिर तो
हंसते –गाते भी चल पड़ेंगे जंगलों के रास्ते भी।। Thursday, October 24, 2013
मजबूर हैं हम, हमारी खामोशी को कौन समझे?
पिछले दिनों महीनों बाद गांव से एक पुराने साथी लखन का फोन आया। हाल बेहाल था, उसकी सांसें पांच माह के बच्चे की तरह तेज चल रही थी। उसकी हांफती आवाज और तेज सांसों से साफ पता चल रहा था कि कि वह किसी बड़े महासंग्राम मे कूदा पड़ा है। किसी तरह गिर-भाग कर अपनी सलामती की खबर मुझे सुनाते हुए हंसे जा रहा था। मैं आश्चर्यचकित था कि रोते हुए भी हंस रहा है बंदा, आखिर बात क्या है? घर उजड़ चुका था, फिर भी पागलों की तरह हंसे जा रहा। हंसे भी तो क्यों न, आखिर बात उसकी जान बच जाने की थी। उसकी लंबी आप बीती सुनने के बाद पता चला कि गांव मे हाथियों ने कोहराम मचा रखा है। क्यों, मालूम नहीं। आखिर हो क्या रहा हमारे देश, समाज में? नजरें जिधर घुमाओ तबाही जारी है। कब तक चलेगी ? मालूम नहीं। किस हद तक होगी ? मालूम नहीं। इसमें अपने भी शामिल होंगे ? कहा नहीं जा सकता। पहाड़, जंगल सब बेच कर खा रहे ये 110% ईमानदार नेता, अफसर और कुदरत का कहर झेले उत्तराखण्ड, झारखण्ड और पूरे देश के गरीब लोग। जिसे गरीबी का मतलब मालूम नहीं, वो एक गरीब देश को कैसे चला सकता है ? परिणाम सबके सामने है। कौन कहता है गरीबी मिट गई
हिन्दुस्तान से, कभी महलों से झांक कर देखो तो। चांद के पार चलो के तर्ज पर
बेशर्मी की हद के पार चलो पर जैसे कुछ हरामखोर नेता-मंत्रीयों में बयानबाजी का
मुकाबला छिड़ी है। तभी तो भारत माता के वीर जवान शहीद होते और ये कहते जवान तो
शहीद होने के लिए होते ही। मां कसम अगर भारत-पाक युद्ध की घोषणा हुई तो पाकिस्तान
छोड़ पहले इन्हीं कुत्तों के घर जाउंगा सर काटने, आर या पार। खैर ये तो रहा पूरे
देशवासियों का दर्द, मामला हमारे गांव में हाथियों के कहर का है। लगभग 15 के झुंड
मे आए हाथियों की मांग थी कि उनका जंगल कहां है ? समझाने की बहुत कोशिश की, कि हमारी कोई गलती
नहीं, ये सब कोयला मंत्रालय और जंगल विभाग वालों के कारनामे... अपनी पूरी बात कह
पाता उससे पहले एक-एक झटके मे कई घरों के नक्शे बदल गए हाथी महाराज ने। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता या उन्हें समझा पाता, हाथियों के सरदार आंखों मे
आंखें डाल कह गए फिर मिलेंगे। अगले शाम रात का भोजन कर ही रहा था कि हाथियों के
दोबारा आगमन की खबर कानों तक पहुंची। हैरान हूं यह
सोचकर कि आज जहां इंसान अपने कहे को पूरा नहीं कर पाता वहीं हाथियों ने कर दिखाया। शायद
उन्हें उनके सवालों का जवाब गले से नहीं उतर पा रहा था। तभी तो दोबारा गांव पहुंच
घरों के नक्शे बदलने के बाद भी उसे जमीन में मिला देना ही बेहतर समझे। फिर क्या था
पलक झपकते ही कई घरों को मिट्टी में मिलते देर नहीं लगी। किस्मत वाले रहे गांववाले
जो इस बार हाथी गलती से कहना भूल गए कि फिर मिलेंगे। आखिर कौन है
जिम्मेवार इन मासूमों की बर्बादी का ? दिल में एक कस्मकस
रह गया- काश उन 110% ईमानदार नेताओं का पता
दे पाता हाथियों को। खैर जो भी हो
गरीब लोग है, हिम्मत है मुसीबतों से लड़ने की। बस दुआ है भगवान हिम्मत दे फिर तो
हंसते –गाते भी चल पड़ेंगे जंगलों के रास्ते भी।। Tuesday, August 20, 2013
दिल तो बच्चा है जी..
रोक पाए न जिसको ये सारी दुनिया, वो एक बूंद आंख
का पानी हूं मैं।
सबको प्यार देने की आदत है हमें, अपनी अलग पहचान
बनाने की आदत है हमें,
कितना भी गहरा जख्म दे कोई, उतना ही ज्यादा मुस्कुराने की आदत है हमें।
इस अजनबी दुनिया मे अकेला ख्वाब हूं मैं, सवालों से खफा
छोटा सा जवाब हूं मैं।
जो समझ न सके मुझे उनके लिए कौन, जो समझ गए उनके
लिए खुली किताब हूं मैं।
आँखों से देखोगे तो खुश पाओगे, दिल से पूछोगे तो
दर्द का शैलाब हूं मैं।
अगर रख सको तो निशानी, खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूं मैं, सिर्फ एक कहानी हूं मैं।।
हाय कुकड़ू कैसे हो? आशा करता हूं कि
तुम सब अच्छे होगे। आज बड़े दिनों बाद ही सही ये खत लिखते हुए मुझे यह सोच कर काफी
खुशी महसूस हो रही है कि कुछ पल बाद यह संदेश तुम्हारे कोमल हाथों को होते हुए आंखों के रास्ते सीधे तुम्हारे सो-स्वीट हार्ट तक पहुंचेगी। मुझे मालूम है कि तुम
खफा हो मुझसे और हो भी क्य़ों
न! गलती करने की आदत जो है हमें। सच कहूं तो तुम्हारी जगह मैं होता तो मैं भी गुस्सा
होता। वैसे भी अजीब सी हालात होते हैं इस मोहब्बत में, उदास जब भी अपना
यार हो कसूर हमेशा अपना सा ही लगता है। खैर जो भी बात रही हो मैं कोई बहाना बना कर तुम्हें और नाराज नहीं करना चाहता। मैं चाहूंगा कि तुम यह महसूस करते हुए मेरी आवाज
सुनो जैसा मैं कहना चाह रहा हूं आगे की लाइनों मे। मैं घुटनों के बल बैठकर तुम्हारा हाथ
पकड़े यह खत तुम्हें देते हुए अपने दिल में हाथ रखकर तहे दिल से माफी मांग रहा हूं। SORRY SORRY SORRY SOORRY SORRY SOORRY
SOOORRY SORRYYYYYY प्लीज़ एक बार और सुनो न ऐसे ही दोबारा करके। अब मुस्कुरा
भी दो न प्लीज प्लीज प्लीज। मेरा इतिहास कहता है कि तुम जरूर हंस रहे होगे। एक बार
फिर सर उठाते हुए वही दुवा निकल रही है मेरे दिल से- हे मालिक इनकी यह खुशी हमेशा दिल में यूं ही बनाए रखना चाहे मुझसे
मेरी खुशी छीन लो। अब क्या सोच रहे हो? यही सोच रहे होगे कि इसे माफ करूं या न करूं? यह बताने की
जरुरत नहीं। तुम्हारी हंसी कुछ न कहते हुए भी सब कुछ कह गई। कोई जाने या न जाने
तुम्हारी हंसी बहुत कुछ कहती है और मैं यह कान बंद कर भी सुन सकता हूं। आखिर ऐसा कभी
हुआ क्या कि तुम कुछ सोचो,
कहना चाहो, महसूस करो और वो मैं समझ नहीं पाया तुम्हारे बताने से पहले। सुना है गलतियां तो भगवान से भी हो जाती
है जिनके पास संसार सा बड़ा दिल है। हमारे पास तो उतना बड़ा दिल नहीं पर तुम्हें
थोड़ा सा खुश कर उनका दिल भी जीत सकता हूं। आखिर दिल तो सच्चा है ही दिल तो बच्चा
भी है जी। मेरी चिंता करने की जरुरत नहीं है बस आप खुश रहें य़ही हमारी खुशी है। जब
आप खुश न हों तो एक बार मेरी चिंता जरूर कर लेना। कहते हैं न कि किस्मत कब, किससे, कैसे, कहां मिलवा देती ऊपरवाले को भी नहीं पता। वो मेरी जिन्दगी का सबसे नसीबवाला पल था जब पहली बार
मेरे फोन पर एक 10 अंक वाला नंबर
गलती से मिल गया था। आज भी वह लकी नं. 983******* दिल के एक कोने में सजाए रखा हूं। न जाने किस
कलम से लिखा था हथेली पर वह नंबर मैंने, आज तक दिखे भी नहीं और मिटे भी नहीं।
आपकी किस अदा को मैं एहसान मानूं जिसने मुझे इतना प्यारा बना
दिया। तारीफ करूं तो किस मुंह से? माफ करना जी हमारी जुबान में इतने शब्द नहीं कि आपकी तारीफ कर
पाउं। बस इतना ही कह सकता हूं कि-
जरूर तुम्हें किसी ने दिल से पुकारा होगा, एक बार तो चांद
ने भी तुम्हें निहारा होगा।
मायूस तो हुए होंगे सितारे भी उस दिन, खुदा ने जब जमीन
पर तुम्हें उतारा होगा।।
किसी ने क्या खूब कहा है कि अगर किसी को कुछ देना हो तो उसे
अच्छा सा, यादगार सा वक्त
दीजिए क्योंकि दिए हुए सभी चीज आपको वापस मिल सकते हैं पर वह वक्त और लम्हा कभी
नहीं। और जहां तक मेरी बात है तो मैंने हमेशा यह कोशिश की है। उन्हीं यादगार पलों के
सहारे आज जी रहा हूं। काफी हसीन और जिन्दगी का बेहतरीन पल महसूस करता हूं जब
तुम्हारे साथ बिताये एक एक पल याद आते हैं। वो तुम्हारा पास पास, मेरी चुटकी, पारसनाथ पार्क, तुम्हारे मामा घर
का वो एक दिन, मेरे मामा घर का
एक दिन, जामाडोबा का एक
दिन, कुमकुम स्टोर, वाटर बोर्ड, कतरास मेला, होली का वह पूरा
रंग, तुम्हारा आम का
पेड़.... बस बस अब आंसू आ जाएंगे। वक्त बदला है, जिन्दगी बदली है पर आज भी प्यार वही है और मरते
दम तक रहेगा। ऐसा बहुत हुआ कि हमारे रिश्ते की दूरी कभी कभी बढ़ी जरूर पर टूटी नहीं
क्योंकि हमारा प्यार सच्चा था। फिर आप कभी न बात करने की बात क्यों करते हो? अगर सच में आप यह
चाहते हो तो बस एक बार बता देना की मुझे तुमसे बात नहीं करनी अब, खुदा कसम
धर्माबांध की नदी मे मुन्डी डुबा डुबा के पि़टूंगा। बुरा लगा ? लगा तो लगा मैं
क्या करूं। अरे घोंची इतना सा मजाक भी नहीं कर सकता क्या ? आप हमे भूल जाओ
हमें कोई गम नहीं, पर जिस दिन हम
आपको भुला दें समझ लेना इस जमाने में हम नहीं। जिन्दगी में जो चीज हमें सबसे प्यारी
लगती है, उसे पाना सबसे
मुश्किल भी होता है और कभी कभी लगता है कि ये इश्क नहीं आसान,
बस इतना समझ लीजिए, यह एक आग का दरिया है और डूब के जाना है। सभी को मेरा
प्यार भरा पानी पिला देना अपने हाथों से। ठीक है तो अब बाकी की बातें बाद में।
अच्छे से रहना, अपना ख्याल रखना।
अगर गलती से भी मेरी कोई बात तुम्हारे दिल को तकलीफ पहुंचा गई तो दिल तो बच्चा है
जी समझ कर वही पुराने वाले स्टाइल से माफ कर देना।
हम हैं राही प्यार के फिर मिलेंगे चलते चलते।।। टा टा टा
वही पुराना घोंचू।।।
2014 चुनाव और आशा की नई किरण- मोदी
महंगाई आसमान छू रही हो, भ्रष्टाचार चरम पर हो, अपराध प्रशासन के नियंत्रण से बाहर हो, राजनीतिक समीकरण बन-बिगड़ रहा हो और जनता के पास लाचारी से जीने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं। ऐसे मे आम चुनाव साल भर दूर हो और चुनावी चहल-पहल सर चढ़ कर बोलने लगे तो कोई आश्चर्य़ की बात नहीं। जी हां हम बात कर रहे हैं 2014 आम चुनाव की। आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हो चुका है। सभी नेता एक दूसरे पर कटाक्ष करने मे लगे हुए हैं। लोगों को भ्रम है कि कौन सही है और कौन गलत। जनता मे भारी गुस्सा है और वह बदलाव चाह रही है। जनता अपने-आप को कोस पाने से नही रोक पा रही है कि जिन्हे अपना प्रतिनिधि चुन संसद मे भेजते हैं वही जनता को भूल जाता है। ऐसे मे चुने तो चुने किसे ? नरेन्र्द मोदी, एक ऐसा नाम जिनके नाम से गुजरात के साथ पूरे भारत के लोगों के सामने भविष्य की एक नई उम्मीद और आशा की किरण दिखाई देने लगती है। पिछले कुछ सालों मे जिस रफ्तार से महंगाई, भ्रष्टाचार, अपराध जैसे मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है, लोगों की रुझान और विश्वास भी सरकार से काफी हद तक गिरा है। पिछले दिनो लगातार तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने नरेन्र्द मोदी को अब लोग दिल्ली के गलियारे से जोड़ कर देखने लगे हैं। इसका सामाजिक आकलन इस बात से लगाया जा सकता है, आज आमतौर पर हर गली-चौराहेों मे मोदी की गूँज साफ सुनाई दे रही है। आए दिनो समाचार चैनलों और अखबारों मे हुए सर्वे की माने तो इसमे भी नरेन्र्द मोदी अपने कथित प्रतिव्दंदी राहुल गांधी और अन्य के मुकाबले काफी आगे माने जा रहे हैं। भले ही भारतीय जनता पार्टी ने अपने भावी पीएम उम्मीद्वार के नाम की घोषणा अभी तक नहीं की हो पर लोगों को अपने आगामी पीएम की तस्वीर साफ नजर आने लगी है। पिछले दिनों नरेन्र्द मोदी का दिल्ली आना और राजनाथ सिंह से मुलाकात करना, लोगों के सामने कई सवाल छोड गए। दिल्ली के विख्यात श्रीराम काँलेज मे मोदी के आगमन पर पूरी मीडिया जगत के साथ-साथ राजनीतिक पार्टियों की भी कड़ी नजर थी। पूरे देश भर मे उनके घंटे भर के भाषण की खूब सराहना की गई। वहां मौजूद छात्रों के जोश और उमंग को देखकर देश भर मे मोदी के प्रति विश्वास की किरण नहीं फैली होगी, इसे नकारा नही जा सकता। आम लोगों की बात तो दूर, मोदी के भाषण की प्रतिक्रिया के लिए कांग्रेस के किसी नेताओं के पास भी सटीक सा जवाब नही था। तकनीक का विकास हुआ है, समय बदला है, सोंच बदली है पर आज भी देश की बड़ी आबादी इस बदलाव से अंजान है। और ऐसे आम लोगों के व्दार पहुंच उनका विश्वास जीतना मोदी को भली-भांती आता है। जिस मॉडल और गति के आधार पर मोदी ने गुजरात का चहुंमूखी विकास किया है, पूरे भारतवासियों की उम्मीदें नरेन्र्द मोदी पर टिकी जरुर है। नरेन्र्द मोदी और गुजरात के विकास की गुणगान भारत समेत पूरे विश्व भर मे हो रही है इसमे कोई संदेह नहीं, पर भाजपा के लिए सबसे ब़डी चुनौती यह है कि आपसी मतभेदों और बयानबाजी से बचना होगा। एक ओर जहां कांग्रेस महंगाई, भ्रष्टाचार, अपराध पर अंकुश लगा पाने में सफल नही हो पा रही है वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी विपक्ष मे होने का पूरा फायदा नहीं उठा पाई है। जिस तरह से पिछले कुछ महीनो मे सरकार के खिलाफ एक से बढ़कर एक घोटालों का उजागर हुआ, विपक्ष के पास अच्छा मौका था उन मुद्दों को आम जनता के समक्ष लाकर उनका विश्वास जीतने का। लेकिन अफसोस कि बीजेपी इस सुनहरे अवसर को चूक गई और अपने आपसी मुद्दों, मतभेदों मे ही छाए रहे। मोदी की जीत ने कुछ हद तक भाजपा की मुश्किलों को कम जरूर कर दिया है पर सवाल ये है कि भाजपा अपने सहयोगी पार्टियों से तालमेल बना पाती है या नही ? अटकलें ये भी लगाई जाने लगी थी कि इतिहास बदलेगा और किसी तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी पर ये किसी कल्पना से कम नहीं। उधर आडवाणी ने यह बयान देकर मामला और भी गर्म कर दिया कि अगले पीएम न कांग्रेस के होंगे न ही बीजेपी की। अब देखना दिलचस्प होगा कि 2014 का ताज किसके सर बंधता है ? बीजेपी हो या कांग्रेस 2014 का चुनाव दोनो के लिए आर या पार के तौर पर देखें तो कोई गलत नहीं होगा।
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