15 नवंबर 2000, बुधवार का वह दिन जब बिहार के
दक्षिणी हिस्से को अलग कर झारखण्ड के रूप मे एक अलग राज्य बनाए जाने की घोषणा संसद
मे की गई, निश्चित तौर पर झारखण्ड -वासियों में एक खुशी की लहर इस आस मे जरूर दौड़ी
कि अब पहले की अपेक्षा हम सभी तक विकास की किरणें तेज गति से पहुंचेगी। मुझे आज भी
याद है सन 2000 तक झारखंड के लगभग एक तिहाई हिस्सों तक सड़कें, बिजली, पानी मानो
ईद की चांद की तरह नजर आ जाती, तो लोग इसे बड़ा विकास मान बैठते। एक ऐसे अलग राज्य
बनने के बाद लोगों की उम्मीद की रफ्तार चौगुनी बढ़नी स्वभाविक है जहां देश भर के
राज्यों की तुलना मे प्राकृतिक संसाधनें व्यापक मात्रा मे मौजूद हो। लोहा, अभ्रक,
कोयला, ग्रेफाइट, चूना पत्थर, बॉक्साइट, यूरेनियम जैसे तमाम खनिज संपदाओं से भरपूर
झारखंड राज्य बनने के बाद कयास लगाए जाने लगे थे कि अब यह तेजी से बढ़ता, उभरता
भारतीय राज्यों की श्रेणी मे शामिल होगा। पर दुर्भाग्य की बात है कि सम्पूर्ण
भारतवर्ष मे बिजली और खनिज पहुंचाकर रोशन करने वाला राज्य खुद अंधेरे से उभर नहीं
पाया।
विकास के रास्ते से बहुत दूर भटकते झारखंड के राजनीतिक इतिहास को
देखें तो इस प्रदेश की उन्नति न हो पाने का सीधा कारण हर साल-दो साल में सरकार का
बदल जाना अर्थात अस्थिर सरकार है। झारखंड के निर्माण से लेकर अब तक साढ़े तेरह
वर्षों मे कुल नौ मुख्यमंत्रियों के बदले जाने से इस राज्य की दशा और दिशा का
अनुमान लगाया जा सकता है। राज्य मे कोई भी सरकार सफलतापुर्वक अपना कार्यकाल पूरा
नहीं कर पाई है। इसके पीछे के कारणों की पड़ताल करें तो पहली बात प्रदेश का खंडित
जनादेश और राजनीति में छोटी क्षेत्रिय पार्टियों का खासा वर्चस्व सबसे बड़ा कारण
है। जातिवाद से भरपुर चुनावी संग्राम मे किसी भी दल को कभी बहुमत नहीं मिल पाया है।
दूसरी बात झारखंड पिछड़ी जातियों और जनजातियों से भरा आदिवासियों का गढ़ है। जहां
तक मेरा मानना है आज भी आदिवासियों के साथ-साथ बहुत बड़ा सामान्य वर्ग अपने मत का
उपयोग बिना सोचे समझे किसी भी प्रत्याशी को दे देने पर पड़ने वाले व्यापक प्रभाव
को जानते हुए भी अनजान है। यह बात और है कि आरक्षित सीटों के साथ साथ अन्य सीटों
के निर्वाचित लगभग सभी सदस्य दसवीं पास न हो पर सरकारी खजानो को अपने घर भरने के
मामले में मैनेजर के बाप जरूर हैं। इसे सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य कि एक लोकतंत्र में एक निर्दलिय विधायक किसी राज्य का मुख्यमंत्री बन जाए। पर इससे बड़ा
दुर्भाग्य भी क्या हो सकता है जब उस निर्दलिय विधायक मुख्यमंत्री के साथ उस
कैबिनेट के पांच मंत्री अगले कुछ सालों में ही संगीन भ्रष्टाचार के अपराध मे जेल
चले जाए। प्रदेश की जनता का क्या कहना वो तो जेल से भी चुनावी मैदान मे उतरे कैदी
को अपनी जाति के आधार पर मत देकर विजयी बना दे। चुनाव के बाद अधिक संख्या वाले दल
के वरिष्ठ नेता भले ही मंत्रीमंडल मे शामिल न हो पाए पर दो विधायकों के साथ किसी
दल का नेता उप-मुख्यमंत्री और कोई निर्दलिय विधायक मुख्यमंत्री भी बन जाए तो यह झारखंड
की ही कहानी हो सकती है। क्षेत्रिय दलों की बढ़ती भागीदारी ही आज नित नई राजनीतिक
दलों के निर्माण का महत्वपूर्ण कारण है। पिछले विधानसभा चुनाव पर गौर करें तो निर्दलिय
विधायकों की संख्या भी बढ़ी है। इससे बड़ी दुख की बात नहीं हो सकती जब राज्य की
बड़ी आबादी सिर्फ इस बात पर वोट कर देता हो कि वो वर्षों से उसी पार्टी को वोट
करते आए हैं। हजार- करोड़ का भ्रष्टाचार भी धुंधला हो जाता है जब चुनाव के ऐन वक्त
पहले मतदाताओं के चेहरे पर सौ के नोट दिए जाने की खुशी साफ- साफ देखी जा सकती है। ऐसे
मतदाताओं की संख्या हर गली- मोहल्लों मे बहुतों की संख्या में है और यह संख्या यह
दर्शाता है कि राज्य की घनी आबादी आज भी लोकतंत्र का सबसे बड़ा दान मतदान की
महत्ता को समझ नहीं पाई है। यहां की साक्षरता दर भले ही सरकारी आंकड़ों में तेजी से
बढ़ी हो पर हकीकत़ यह है कि आज भी 75 फीसदी सरकारी स्कूलों का हाल बद से बदतर है।
बेइमानी और हताशा ने लोगों को इस कदर प्रभावित किया है कि उनमे चुनाव से अभिरुचि
हट सी गई है।
जरुरत है कि शिक्षित युवा वर्ग चुनावों मे आगे आएं और लोगों में जागरुकता
फैलाएं, उन्हे परिचित कराएं झारखंड की कराहती आत्मा से। लोगों तक यह संदेश फैलाएं
कि जातिगत और परंपरागत वोट का उपयोग न कर अपने घर, परिवार, समाज, राज्य के विकास
को ध्यान में रखकर पढ़े- लिखे समझदार उम्मीदवार को ही वोट करें। नेताओं के बहकावे
में न आकर सोच-समझकर ही फैसला करें। यहीं से झारखंड के विकास की गाथा बुनी
जा सकती है। अन्यथा एक-एक वर्ष की साझेदारी से ये पार्टियां सरकार चलाती रहेगी और
विकास का पहिया पीछे लुढ़कता जाएगा। झोलियां भरेगी तो सिर्फ अनपढ़ नेताओं के साथ पढ़े
लिखे प्रशासनिक अधिकारियों की।