Thursday, August 14, 2014

तेरी यादों का ताजमहल बनाउंगा...

जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था वो। मैं घंटों से इसके अस्पताल( सर्विस सेंटर) के बाहर इस इंतजार में बैठा रहा कि डॉक्टर(मैकेनिक) अच्छी खबर लेकर बाहर आएंगे। मेरी निगाहें अस्पताल की उस हरी और लाल बत्ती (काल्पनिक) से हटने का नाम नहीं ले रही थी। दिल की धड़कनें काफी तेज गति से धक-धक, धक-धक कर रही थी। हादसा बेहद खतरनाक हुआ था। दिल( मदरबोर्ड) पर चोटें आई थी। आस-पास के सभी डॉक्टर्स ने लाल बत्ती जला दी थी। दूर-दूर तक कोई आश नजर नहीं आ रहा था। पर मेरे जेहन में उसे बचाने की जिद थी। उसे बचाना है, अपने-आप में ठान रखा था। आखिर छह साल का खून का संबंध तो नहीं पर दिल का मजबूत रिस्ता था उससे। बहुत ही लाड-प्यार से रखा था उसे। पांच-पांच सेकेंड पर ऑपरेशन रूम का खुलता दरवाजा मुझमें उम्मीद जगा रहा था कि कुछ अच्छी खबर सुना जाए कोई। काश ऐसा होता जाको राखे साइयां मार सके न कोय...पर होनी को कौन टाल सकता है। डॉक्टर बाहर आए और हमेशा की तरह बोल पड़े “आई एम सॉरी, मैं इसे बचा नहीं पाया। कोई नया दोस्त बना लो, बाजार में तो गजब-गजब के दोस्त मिल रहे हैं आज कल।" सुनकर एक पल के लिए खुशी हुई, यह सोचकर कि चलो अब नया दोस्त आएगा जिंदगी में। पर छह साल तक उसके साथ गुजारे हर पल, हर लम्हे की तुलना में नए दोस्त बनाने की खुशी कहीं कमजोर मालूम पड़ रही थी। भला कौन इतने दिनों तक साथ देता है आज कल। बड़े ही दुख (इतना दुख कभी नहीं हुआ) के साथ कहना पड़ रहा है कि मेरे प्रिय दोस्त जो कि पिछले छह साल से हरदम मेरे सुख-दुख का साथी रहा, आज उसका स्वर्गवास हो गया। माफ करना मेरे दोस्त मैं तुम्हें बचा नहीं पाया। अपने खून का एक-एक कतरा तुझे देने को तैयार था पर कम्बख्त डॉक्टरों नें कहा तुम्हारा खून इलेक्ट्रिक नहीं है। गरमी हो, बरसात हो या हार्ड कंपाने वाली सर्दी हो सदा साथ निभाया। हर एक चौराहे के साथ दोस्त बदल जाने के जमाने में तुमने छह साल तक हमेशा साथ दिया, मैं तहे दिल से उसका शुक्र-गुजार हूं। तेरी यादें इतनी है कि मैं बयां नहीं कर सकता। मैं तुम्हें दफनाउंगा नहीं मेरे दोस्त। तेरी यादों का ताजमहल मेरे घर के ही किसी कोने में बनाउंगा। हमारी दोस्ती की मिशाल, अगले दोस्त को जरूर बताउंगा कि तुम चार दिन में पों-पों करने लगे, इधर देखो इसे, छह साल तक कभी रोया नहीं।
अलविदा मेरे दोस्त( सैमसंग S5233)

Friday, July 25, 2014

कितना गिराओगे चौथे स्तंभ को..

रात दो बजे ऑफिस से आने के बाद भी अहले सुबह तक घर के बाहर पार्क में बैठा सोचता रहा, ये मीडिया भी क्या चीज है एक तरफ दुनिया का आइना होने की बात करता है तो दूसरे तरफ सिवाय रुपये के नोटों के कुछ नहीं। मैं इसे हरगिज़ लोकतंत्र का खंभा नहीं मानता जब तक कि बेबाक और बेबस करोड़ो लोगों की आवाज बिना चिल्लाए इन पैसे के दल्लों के कानों तक न पहुंचने लगे। मेरा अपना तजुर्बा है, जहां भी गया, चाहे रेल का सफर, हाट-बाजार की सब्जी मंडी या घर के किचन में खाना पकाती मां, सबकी जुबां में एक ही बात, ये मीडिया दलाल है। ऐसा लगता है मानो बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया गया हो कि मीडिया.. दलालों का अड्डा। सुना बहुत था कि मीडिया खबरों के साथ पक्षपात करता है, पर कल मैं साक्षात इससे रूबरू हुआ। बड़ी खबर थी आसमान छूती महंगाई से त्रस्त कुछ लोगों ने भाजपा के नामी नेता के सगे भाई के साथ मोदी का पुतला दहन करते हुए भाजपा को अलविदा कहा। अफसोस ये जनसत्ता या इंडियन एक्सप्रेस नहीं जहां इस खबर को बड़ी जगह दी जाती। मुझे मालूम था हमारा मीडिया ओर्गेनाइजेशन को भाजपा की बुराई हजम नहीं होगा। फिरभी मैने इसका खयाल न करते हुए एक बार सोचा और सेकेंड लीड के साथ मैने हेडिंग दी- टमाटर 80 के पार, बाय बाय मोदी सरकार। जब सीनियर एडीटर की नजर इस खबर पर पड़ी तो वो हंस पड़े, मैं देखता रहा। उन्होंने धीरे से कहा सुनो इस खबर को हटा दो। दो दिन पहले वही सर मुझे समझा गए थे कि खबरों को उसके मूल्य के आधार पर जगह दो। अफसोस कि उस खबर को न के बराबर पेश किया गया। क्या इतनी बड़ी खबर सिर्फ इसलिए खत्म हो गई कि यह भाजपा के मान-सम्मान की बात थी। माफ करना जी जो खबर है वही खबर बननी चाहिए। हम कौन होते हैं भाजपा और कांग्रेस को लाड-प्यार करने वाले। हमारे धर्म में यह नहीं, दलाली ही करनी तो प्रोपर्टी डीलींग का धंधा कर लो। अरे और कितना गिराओगे इस लोकतंत्र के खंभे को, कहीं ध्वस्त न हो जाए। हम पत्रकारों को बेबस मत करो। माना कि अभी हम कच्चे हैं पर इरादे पक्के हैं। सैल्यूट टू यशवंत सिंह, प्रमोद रंजन.. आप सभी को हमेशा मेरा साथ रहेगा। अभी तक खुद से विचार कर रहा हूं- क्या मीडिया को अब दलाल के नाम से ही पहचाना जाएगा, कहां गए वो खादी का कुरता, झोला और कलम लेकर सच्ची पत्रकारिता करने के दिन, क्या अब सिर्फ एसी में बैठकर कॉपी-पेस्ट भर तक की पत्रकारिता रह गई है। मुझे याद है आईआईएमसी के पहले सप्ताह का परिचय कक्षा। जिसमें तमाम पत्रकार दोस्त पत्रकारिता को पैसे के लिए कम, एक मिशन के तौर पर ज्यादा पेश करते नजर आए थे। क्या उस मिशन का रास्ता पैसों के आगे बंद हो जाता है। इस पैसे के मिशन में दीपक चौरसिया से लेकर प्रभु चावला जैसे बड़े पत्रकारों को डूबते देखा है मैंने। आओ मिलकर कुछ करें, जहां भी हैं आवाज उठाएं, सोचे, एक नई शुरूआत करें।

तेरी याद बहुत अब आने लगी है..

अब तक सोया नहीं, करवटें बदलता रहा, नम आंखें खुली रही पूरी रात। घर पर ही हूं पर घर में नहीं। आंखें भर आई है। कभी बालकनी से आसमान की ओर तो कभी तस्वीरों को निहारती ये नम आंखें। तुम्हारे ही बनाए इश्क के घोषणापत्र जिसमें साफ-साफ तुमने लिखा है कि तुम जब भी मुझे दिल से याद करो तुम्हारी कसम मुझे इसका एहसास हवाओं के रुख से हो जाता है के अनुसार तुम्हें मेरी इन सभी हरकतों का एहसास हो गया होगा। आज फिर रात के दोपहर में अकेला बैठा छठी मंजिल की बालकनी से पुरबईया हवाओं को मैं भी सुनने की कोशिश करता रहा। हवा के अचानक घटती-बढ़ती रूख ने तुम्हारी नाराजगी का एहसास दिला दिया। आश्चर्य होने की बजाय एक छोटी पर मीठी सी मुस्कान भर आई जब इस घोषणापत्र की बात बहुत दिनो बाद ही सही पर शत-प्रतिशत सच साबित हुई। रात के 4 बजकर 57 मिनट पर फोन की घंटी बजी और आवाज आई तुम सोये नहीं अब तक? यह आवाज सुनकर आंसू की दो धाराएं निकल पड़ी और मानो मुझसे कह रही हो कि कसूर तो दिसंबर का था जो साल बदल गया, तेरी यादों को भुला दें वो साल बदला ही नहीं। धाराएं थोड़ी तेज होने के साथ मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ। एक इंसान चाहे दुनिया भर की सैर करने निकला हो पर अंत मे थका हारा अपने घर ही पहुंचता है। जिन्दगी की जरूरतें और उलझने लोगों से बात करने कम कर देती है और लोग समझते हैं हम बदल गए। न जाने क्यों, कब, कहां से हमारी दूरी थोड़ी बढ़ी सोच न सका। आज जब कॉलेज का आखिऱी दिन खत्म हुआ तो अपने आप को एक ऐसे मोड़ मे खड़ा पाया जहां से मेरे मुड़ने के हर रास्ते तुम्हारे गांव की ओर जाते हैं। अपने गांव की मिट्टी की खुशबू से लिपट जाना चाहता हूं। तुम हमेशा कहा करते थे न कि जब भी तुम्हे अकेलेपन का एहसास सताने लगे, तुम चाहे मुझसे मीलों दूर बस जाओ पर तुम्हारे लिए ये बाहें फैलाए जिन्दगी भर तुम्हारा इंतजार करेगी। किस गली आ गया हूं मैं जहां हर कोई अपना होते हुए भी अपने नहीं लगते। मैं आ रहा हूं। गलती का तो पता नहीं पर माफी मांगने की तो आदत सी हो गई है।

दौलत के तराजू में न तौलो मोहब्बत को

आज वही चेहरा फिर मेरी आंखों के सामने मंडरा रहा है जिसने सालों पहले मुझ गरीब को छोड़ किसी अमीर अपने के साथ चलने का फैसला किया था। मजबूरी थी या मुझे गरीब साबित करने की ढोंग ये तो खुदा भी नहीं जान पाया होगा। एक्टिंग ऐसी कि वो सूरज को तारा कह दे तो आप दिन को भी रात मान बैठें। खेल तो लोग मैदान में हूनर से खेलते हैं कोई घर बैठे आंखों और अदाओं से खेले तो सामने वाले की हार पक्की। उस खेल का हारा था मैं। आज सालों बाद जब उस अमीरी ख्वाहिश वाली मोहतरमा का फोन आया तो थोड़ी देर के लिए सहम गया, कौन सा खेल बाकी रह गया था पता नहीं। न जाने क्यों फूट-फूटकर रो रही थी। वो कुछ बताती उससे पहले मेरे लगाए कयास सही लगने लगे थे। उस अमीर शख्स से उसकी लड़ाई हुई थी और दोनो एक-दूसरे से अलग होने का फैसला कर चुके थे। मुझे मालूम था उसे एक न एक दिन एहसास जरुर होगा कि प्रपोज भले ही मैंने ठीक से न किया हो पर बंदा चाहता बेजोड़ था। उसने मेरी फीलींग्स का मजाक जरुर बना दिया था, उस शख्स के सामने जिससे मोहतरमा अलग होने का फैसला की है, जिसकी मकान मेरे मकान से 5 गुनी थी। माना कि दौलत के तराजू में फकीर थे हम पर दिले-वफा में तौल पाओ वो तराजू आया नहीं। क्या उस अमीर शख्स का मकान गिर गया या उसने दिल के किरायेदार को बदल दिया? आज तुम उसी सीढ़ी में खड़ी हो जहां पर सालों पहले मैं गिरा था। आज खुशी मेरे पास है। औकात और हवेली देखकर मोहब्बत करने वालों भले ही तुम चार दिन हाथ में हाथ रख डिस्को में उछल लो पर गांव वाली गरीब काकी जैसी तुम्हारी किस्मत कहां जिसे शादी के 18 साल बाद भी 5 रु के ही सही पर काका के हाथों सुबह शाम मनपसंद चॉकलेट मिलता हो। इस प्यार का तुम्हारे अमीरी शौक से कोई तुलना नहीं। वरन ऐसे शौक पांच-पांच शादियां करने वाले शवेता तिवारी और राजा चौधरी जैसे लोग पालते हैं जिसे मै मोहब्बत हरगिज नहीं मानता। हां मैं उसे तुम्हारा शौक कहता हूं, प्यार कतई नहीं। दिखावे की मोहब्बत से बेहतर है आप नफरत करो हमसे, हम सच्चे जज्बातों की बहुत कद्र करते हैं।

Wednesday, March 12, 2014

13 साल, 9 मुख्यमंत्री... व्यापार सत्ता का !

15  नवंबर 2000, बुधवार का वह दिन जब बिहार के दक्षिणी हिस्से को अलग कर झारखण्ड के रूप मे एक अलग राज्य बनाए जाने की घोषणा संसद मे की गई, निश्चित तौर पर झारखण्ड -वासियों में एक खुशी की लहर इस आस मे जरूर दौड़ी कि अब पहले की अपेक्षा हम सभी तक विकास की किरणें तेज गति से पहुंचेगी। मुझे आज भी याद है सन 2000 तक झारखंड के लगभग एक तिहाई हिस्सों तक सड़कें, बिजली, पानी मानो ईद की चांद की तरह नजर आ जाती, तो लोग इसे बड़ा विकास मान बैठते। एक ऐसे अलग राज्य बनने के बाद लोगों की उम्मीद की रफ्तार चौगुनी बढ़नी स्वभाविक है जहां देश भर के राज्यों की तुलना मे प्राकृतिक संसाधनें व्यापक मात्रा मे मौजूद हो। लोहा, अभ्रक, कोयला, ग्रेफाइट, चूना पत्थर, बॉक्साइट, यूरेनियम जैसे तमाम खनिज संपदाओं से भरपूर झारखंड राज्य बनने के बाद कयास लगाए जाने लगे थे कि अब यह तेजी से बढ़ता, उभरता भारतीय राज्यों की श्रेणी मे शामिल होगा। पर दुर्भाग्य की बात है कि सम्पूर्ण भारतवर्ष मे बिजली और खनिज पहुंचाकर रोशन करने वाला राज्य खुद अंधेरे से उभर नहीं पाया।
विकास के रास्ते से बहुत दूर भटकते झारखंड के राजनीतिक इतिहास को देखें तो इस प्रदेश की उन्नति न हो पाने का सीधा कारण हर साल-दो साल में सरकार का बदल जाना अर्थात अस्थिर सरकार है। झारखंड के निर्माण से लेकर अब तक साढ़े तेरह वर्षों मे कुल नौ मुख्यमंत्रियों के बदले जाने से इस राज्य की दशा और दिशा का अनुमान लगाया जा सकता है। राज्य मे कोई भी सरकार सफलतापुर्वक अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है। इसके पीछे के कारणों की पड़ताल करें तो पहली बात प्रदेश का खंडित जनादेश और राजनीति में छोटी क्षेत्रिय पार्टियों का खासा वर्चस्व सबसे बड़ा कारण है। जातिवाद से भरपुर चुनावी संग्राम मे किसी भी दल को कभी बहुमत नहीं मिल पाया है। दूसरी बात झारखंड पिछड़ी जातियों और जनजातियों से भरा आदिवासियों का गढ़ है। जहां तक मेरा मानना है आज भी आदिवासियों के साथ-साथ बहुत बड़ा सामान्य वर्ग अपने मत का उपयोग बिना सोचे समझे किसी भी प्रत्याशी को दे देने पर पड़ने वाले व्यापक प्रभाव को जानते हुए भी अनजान है। यह बात और है कि आरक्षित सीटों के साथ साथ अन्य सीटों के निर्वाचित लगभग सभी सदस्य दसवीं पास न हो पर सरकारी खजानो को अपने घर भरने के मामले में मैनेजर के बाप जरूर हैं। इसे सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य कि एक लोकतंत्र में एक निर्दलिय विधायक किसी राज्य का मुख्यमंत्री बन जाए। पर इससे बड़ा दुर्भाग्य भी क्या हो सकता है जब उस निर्दलिय विधायक मुख्यमंत्री के साथ उस कैबिनेट के पांच मंत्री अगले कुछ सालों में ही संगीन भ्रष्टाचार के अपराध मे जेल चले जाए। प्रदेश की जनता का क्या कहना वो तो जेल से भी चुनावी मैदान मे उतरे कैदी को अपनी जाति के आधार पर मत देकर विजयी बना दे। चुनाव के बाद अधिक संख्या वाले दल के वरिष्ठ नेता भले ही मंत्रीमंडल मे शामिल न हो पाए पर दो विधायकों के साथ किसी दल का नेता उप-मुख्यमंत्री और कोई निर्दलिय विधायक मुख्यमंत्री भी बन जाए तो यह झारखंड की ही कहानी हो सकती है। क्षेत्रिय दलों की बढ़ती भागीदारी ही आज नित नई राजनीतिक दलों के निर्माण का महत्वपूर्ण कारण है। पिछले विधानसभा चुनाव पर गौर करें तो निर्दलिय विधायकों की संख्या भी बढ़ी है। इससे बड़ी दुख की बात नहीं हो सकती जब राज्य की बड़ी आबादी सिर्फ इस बात पर वोट कर देता हो कि वो वर्षों से उसी पार्टी को वोट करते आए हैं। हजार- करोड़ का भ्रष्टाचार भी धुंधला हो जाता है जब चुनाव के ऐन वक्त पहले मतदाताओं के चेहरे पर सौ के नोट दिए जाने की खुशी साफ- साफ देखी जा सकती है। ऐसे मतदाताओं की संख्या हर गली- मोहल्लों मे बहुतों की संख्या में है और यह संख्या यह दर्शाता है कि राज्य की घनी आबादी आज भी लोकतंत्र का सबसे बड़ा दान मतदान की महत्ता को समझ नहीं पाई है। यहां की साक्षरता दर भले ही सरकारी आंकड़ों में तेजी से बढ़ी हो पर हकीकत़ यह है कि आज भी 75 फीसदी सरकारी स्कूलों का हाल बद से बदतर है। बेइमानी और हताशा ने लोगों को इस कदर प्रभावित किया है कि उनमे चुनाव से अभिरुचि हट सी गई है।
जरुरत है कि शिक्षित युवा वर्ग चुनावों मे आगे आएं और लोगों में जागरुकता फैलाएं, उन्हे परिचित कराएं झारखंड की कराहती आत्मा से। लोगों तक यह संदेश फैलाएं कि जातिगत और परंपरागत वोट का उपयोग न कर अपने घर, परिवार, समाज, राज्य के विकास को ध्यान में रखकर पढ़े- लिखे समझदार उम्मीदवार को ही वोट करें। नेताओं के बहकावे में न आकर सोच-समझकर ही फैसला करें। यहीं से झारखंड के विकास की गाथा बुनी जा सकती है। अन्यथा एक-एक वर्ष की साझेदारी से ये पार्टियां सरकार चलाती रहेगी और विकास का पहिया पीछे लुढ़कता जाएगा। झोलियां भरेगी तो सिर्फ अनपढ़ नेताओं के साथ पढ़े लिखे प्रशासनिक अधिकारियों की।