अब तक सोया नहीं, करवटें बदलता रहा, नम आंखें खुली रही पूरी रात। घर
पर ही हूं पर घर में नहीं। आंखें भर आई है। कभी बालकनी से आसमान की ओर तो कभी
तस्वीरों को निहारती ये नम आंखें। तुम्हारे ही बनाए इश्क के घोषणापत्र जिसमें
साफ-साफ तुमने लिखा है कि “तुम जब भी मुझे दिल से याद करो तुम्हारी कसम मुझे इसका एहसास हवाओं के
रुख से हो जाता है” के अनुसार तुम्हें मेरी इन सभी हरकतों का एहसास हो गया होगा। आज फिर
रात के दोपहर में अकेला बैठा छठी मंजिल की बालकनी से पुरबईया हवाओं को मैं भी सुनने
की कोशिश करता रहा। हवा के अचानक घटती-बढ़ती रूख ने तुम्हारी नाराजगी का एहसास
दिला दिया। आश्चर्य होने की बजाय एक छोटी पर मीठी सी मुस्कान भर आई जब इस
घोषणापत्र की बात बहुत दिनो बाद ही सही पर शत-प्रतिशत सच साबित हुई। रात के 4 बजकर
57 मिनट पर फोन की घंटी बजी और आवाज आई तुम सोये नहीं अब तक? यह आवाज
सुनकर आंसू की दो धाराएं निकल पड़ी और मानो मुझसे कह रही हो कि कसूर तो दिसंबर का
था जो साल बदल गया, तेरी यादों को भुला दें वो साल बदला ही नहीं। धाराएं थोड़ी तेज
होने के साथ मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ। एक इंसान चाहे दुनिया भर की सैर करने
निकला हो पर अंत मे थका हारा अपने घर ही पहुंचता है। जिन्दगी की जरूरतें और उलझने
लोगों से बात करने कम कर देती है और लोग समझते हैं हम बदल गए। न जाने क्यों, कब,
कहां से हमारी दूरी थोड़ी बढ़ी सोच न सका। आज जब कॉलेज का आखिऱी दिन खत्म हुआ तो
अपने आप को एक ऐसे मोड़ मे खड़ा पाया जहां से मेरे मुड़ने के हर रास्ते तुम्हारे
गांव की ओर जाते हैं। अपने गांव की मिट्टी की खुशबू से लिपट जाना चाहता हूं। तुम
हमेशा कहा करते थे न कि जब भी तुम्हे अकेलेपन का एहसास सताने लगे, तुम चाहे मुझसे
मीलों दूर बस जाओ पर तुम्हारे लिए ये बाहें फैलाए जिन्दगी भर तुम्हारा इंतजार
करेगी। किस गली आ गया हूं मैं जहां हर कोई अपना होते हुए भी अपने नहीं लगते। मैं आ
रहा हूं। गलती का तो पता नहीं पर माफी मांगने की तो आदत सी हो गई है।

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