Friday, July 25, 2014

कितना गिराओगे चौथे स्तंभ को..

रात दो बजे ऑफिस से आने के बाद भी अहले सुबह तक घर के बाहर पार्क में बैठा सोचता रहा, ये मीडिया भी क्या चीज है एक तरफ दुनिया का आइना होने की बात करता है तो दूसरे तरफ सिवाय रुपये के नोटों के कुछ नहीं। मैं इसे हरगिज़ लोकतंत्र का खंभा नहीं मानता जब तक कि बेबाक और बेबस करोड़ो लोगों की आवाज बिना चिल्लाए इन पैसे के दल्लों के कानों तक न पहुंचने लगे। मेरा अपना तजुर्बा है, जहां भी गया, चाहे रेल का सफर, हाट-बाजार की सब्जी मंडी या घर के किचन में खाना पकाती मां, सबकी जुबां में एक ही बात, ये मीडिया दलाल है। ऐसा लगता है मानो बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया गया हो कि मीडिया.. दलालों का अड्डा। सुना बहुत था कि मीडिया खबरों के साथ पक्षपात करता है, पर कल मैं साक्षात इससे रूबरू हुआ। बड़ी खबर थी आसमान छूती महंगाई से त्रस्त कुछ लोगों ने भाजपा के नामी नेता के सगे भाई के साथ मोदी का पुतला दहन करते हुए भाजपा को अलविदा कहा। अफसोस ये जनसत्ता या इंडियन एक्सप्रेस नहीं जहां इस खबर को बड़ी जगह दी जाती। मुझे मालूम था हमारा मीडिया ओर्गेनाइजेशन को भाजपा की बुराई हजम नहीं होगा। फिरभी मैने इसका खयाल न करते हुए एक बार सोचा और सेकेंड लीड के साथ मैने हेडिंग दी- टमाटर 80 के पार, बाय बाय मोदी सरकार। जब सीनियर एडीटर की नजर इस खबर पर पड़ी तो वो हंस पड़े, मैं देखता रहा। उन्होंने धीरे से कहा सुनो इस खबर को हटा दो। दो दिन पहले वही सर मुझे समझा गए थे कि खबरों को उसके मूल्य के आधार पर जगह दो। अफसोस कि उस खबर को न के बराबर पेश किया गया। क्या इतनी बड़ी खबर सिर्फ इसलिए खत्म हो गई कि यह भाजपा के मान-सम्मान की बात थी। माफ करना जी जो खबर है वही खबर बननी चाहिए। हम कौन होते हैं भाजपा और कांग्रेस को लाड-प्यार करने वाले। हमारे धर्म में यह नहीं, दलाली ही करनी तो प्रोपर्टी डीलींग का धंधा कर लो। अरे और कितना गिराओगे इस लोकतंत्र के खंभे को, कहीं ध्वस्त न हो जाए। हम पत्रकारों को बेबस मत करो। माना कि अभी हम कच्चे हैं पर इरादे पक्के हैं। सैल्यूट टू यशवंत सिंह, प्रमोद रंजन.. आप सभी को हमेशा मेरा साथ रहेगा। अभी तक खुद से विचार कर रहा हूं- क्या मीडिया को अब दलाल के नाम से ही पहचाना जाएगा, कहां गए वो खादी का कुरता, झोला और कलम लेकर सच्ची पत्रकारिता करने के दिन, क्या अब सिर्फ एसी में बैठकर कॉपी-पेस्ट भर तक की पत्रकारिता रह गई है। मुझे याद है आईआईएमसी के पहले सप्ताह का परिचय कक्षा। जिसमें तमाम पत्रकार दोस्त पत्रकारिता को पैसे के लिए कम, एक मिशन के तौर पर ज्यादा पेश करते नजर आए थे। क्या उस मिशन का रास्ता पैसों के आगे बंद हो जाता है। इस पैसे के मिशन में दीपक चौरसिया से लेकर प्रभु चावला जैसे बड़े पत्रकारों को डूबते देखा है मैंने। आओ मिलकर कुछ करें, जहां भी हैं आवाज उठाएं, सोचे, एक नई शुरूआत करें।

तेरी याद बहुत अब आने लगी है..

अब तक सोया नहीं, करवटें बदलता रहा, नम आंखें खुली रही पूरी रात। घर पर ही हूं पर घर में नहीं। आंखें भर आई है। कभी बालकनी से आसमान की ओर तो कभी तस्वीरों को निहारती ये नम आंखें। तुम्हारे ही बनाए इश्क के घोषणापत्र जिसमें साफ-साफ तुमने लिखा है कि तुम जब भी मुझे दिल से याद करो तुम्हारी कसम मुझे इसका एहसास हवाओं के रुख से हो जाता है के अनुसार तुम्हें मेरी इन सभी हरकतों का एहसास हो गया होगा। आज फिर रात के दोपहर में अकेला बैठा छठी मंजिल की बालकनी से पुरबईया हवाओं को मैं भी सुनने की कोशिश करता रहा। हवा के अचानक घटती-बढ़ती रूख ने तुम्हारी नाराजगी का एहसास दिला दिया। आश्चर्य होने की बजाय एक छोटी पर मीठी सी मुस्कान भर आई जब इस घोषणापत्र की बात बहुत दिनो बाद ही सही पर शत-प्रतिशत सच साबित हुई। रात के 4 बजकर 57 मिनट पर फोन की घंटी बजी और आवाज आई तुम सोये नहीं अब तक? यह आवाज सुनकर आंसू की दो धाराएं निकल पड़ी और मानो मुझसे कह रही हो कि कसूर तो दिसंबर का था जो साल बदल गया, तेरी यादों को भुला दें वो साल बदला ही नहीं। धाराएं थोड़ी तेज होने के साथ मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ। एक इंसान चाहे दुनिया भर की सैर करने निकला हो पर अंत मे थका हारा अपने घर ही पहुंचता है। जिन्दगी की जरूरतें और उलझने लोगों से बात करने कम कर देती है और लोग समझते हैं हम बदल गए। न जाने क्यों, कब, कहां से हमारी दूरी थोड़ी बढ़ी सोच न सका। आज जब कॉलेज का आखिऱी दिन खत्म हुआ तो अपने आप को एक ऐसे मोड़ मे खड़ा पाया जहां से मेरे मुड़ने के हर रास्ते तुम्हारे गांव की ओर जाते हैं। अपने गांव की मिट्टी की खुशबू से लिपट जाना चाहता हूं। तुम हमेशा कहा करते थे न कि जब भी तुम्हे अकेलेपन का एहसास सताने लगे, तुम चाहे मुझसे मीलों दूर बस जाओ पर तुम्हारे लिए ये बाहें फैलाए जिन्दगी भर तुम्हारा इंतजार करेगी। किस गली आ गया हूं मैं जहां हर कोई अपना होते हुए भी अपने नहीं लगते। मैं आ रहा हूं। गलती का तो पता नहीं पर माफी मांगने की तो आदत सी हो गई है।

दौलत के तराजू में न तौलो मोहब्बत को

आज वही चेहरा फिर मेरी आंखों के सामने मंडरा रहा है जिसने सालों पहले मुझ गरीब को छोड़ किसी अमीर अपने के साथ चलने का फैसला किया था। मजबूरी थी या मुझे गरीब साबित करने की ढोंग ये तो खुदा भी नहीं जान पाया होगा। एक्टिंग ऐसी कि वो सूरज को तारा कह दे तो आप दिन को भी रात मान बैठें। खेल तो लोग मैदान में हूनर से खेलते हैं कोई घर बैठे आंखों और अदाओं से खेले तो सामने वाले की हार पक्की। उस खेल का हारा था मैं। आज सालों बाद जब उस अमीरी ख्वाहिश वाली मोहतरमा का फोन आया तो थोड़ी देर के लिए सहम गया, कौन सा खेल बाकी रह गया था पता नहीं। न जाने क्यों फूट-फूटकर रो रही थी। वो कुछ बताती उससे पहले मेरे लगाए कयास सही लगने लगे थे। उस अमीर शख्स से उसकी लड़ाई हुई थी और दोनो एक-दूसरे से अलग होने का फैसला कर चुके थे। मुझे मालूम था उसे एक न एक दिन एहसास जरुर होगा कि प्रपोज भले ही मैंने ठीक से न किया हो पर बंदा चाहता बेजोड़ था। उसने मेरी फीलींग्स का मजाक जरुर बना दिया था, उस शख्स के सामने जिससे मोहतरमा अलग होने का फैसला की है, जिसकी मकान मेरे मकान से 5 गुनी थी। माना कि दौलत के तराजू में फकीर थे हम पर दिले-वफा में तौल पाओ वो तराजू आया नहीं। क्या उस अमीर शख्स का मकान गिर गया या उसने दिल के किरायेदार को बदल दिया? आज तुम उसी सीढ़ी में खड़ी हो जहां पर सालों पहले मैं गिरा था। आज खुशी मेरे पास है। औकात और हवेली देखकर मोहब्बत करने वालों भले ही तुम चार दिन हाथ में हाथ रख डिस्को में उछल लो पर गांव वाली गरीब काकी जैसी तुम्हारी किस्मत कहां जिसे शादी के 18 साल बाद भी 5 रु के ही सही पर काका के हाथों सुबह शाम मनपसंद चॉकलेट मिलता हो। इस प्यार का तुम्हारे अमीरी शौक से कोई तुलना नहीं। वरन ऐसे शौक पांच-पांच शादियां करने वाले शवेता तिवारी और राजा चौधरी जैसे लोग पालते हैं जिसे मै मोहब्बत हरगिज नहीं मानता। हां मैं उसे तुम्हारा शौक कहता हूं, प्यार कतई नहीं। दिखावे की मोहब्बत से बेहतर है आप नफरत करो हमसे, हम सच्चे जज्बातों की बहुत कद्र करते हैं।