Thursday, May 12, 2016

हमाम में सब ‪फर्जी हैं...

तो बच्चों आज हम निबंध लिखना सीखेंगे, विषय है... ‪फर्जी
मास्टर जी, "फर्जी" आर "दर्जी" भाई हवै का? नहीं बेयययययययययययय... दर्जी हम सबको मेहनत करके, नाप तौल के पहनाता है कपड़ा... आर ठीक वैसे ही फर्जी भी मेहनत से जुगाड़ करके, बिना नापे तोले फेक के सबको पहनाता है "टोपी"। मस्त टोपी पहनाकर बनाता है अपना थोबड़ा यानी "इंप्रेशन"। अच्छा तो मास्टर जी आप दर्जी हो कि फर्जी। अबे चुप, बकबकाते बहुते हो, हमरी सुनेगा कि खुदे लैक्चर देगा! जी मास्टर जी तो आप हमें टोपी पहनाओ... मतलब पढ़ाओ। सुनो... फर्जी इज द हिंदी नेम ऑफ "फेक" एंड फेक वर्ड इज सिमिलर फ्रॉम...फेंकना। का पढ़ाते हो, मास्टर जी, आसान भाषा में बताओ न, हम हिंदी मीडियम से हैं। अररररररे आसान भाषा में फर्जी बोले तो नकली। नकली पैसा है, नकली दोस्त हैं, नकली नेता हैं, नकली तुम हो, नकली हम हैं, नकली ब्वायफ्रैंड है, नकली गर्लफ्रेंड है, नकली सोना-चांदी है, नकली मैगी है, नकली आईडी है, नकली कसमे वादे हैं, नकली खून भी है और नकली धर्म भी है और नकली डिग्री भी है। जैसे शादी बियाह में तुम फेंकते हो, उड़ाते हो नकली नोट, गर्लफ्रेंड बनाने के लिए इतना लंबा चौड़ा फेंकते हो...! यहीं देख लो बस उदाहरण समझो, तुम पूजा से बेइंतहा प्यार करते हो, उसके बगैर सांस लेना भूल सकते हो, जान दे सकते हो... तुम फर्जी हो। मास्टर जी पूजा के सामने हमारी पोल मत खोलो, खराब लगता है, वरना हम भी मास्टरनी जी को उ बात बताए देंगे। हम असली हैं। हैं न पूजा? चुप रहो, तुमने कहा था फोन रिचार्ज कर देगा कल, किया? नकली आदमी... अरे अरे दोनों चुप हो जाओ। हां तो मैं कहां था... शादी में नोट फेंक रहे थे मास्टर जी। हां तो अब हम आगे बढ़ते हैं। देयर आर मैनी कैटेगरी आफ फर्जीपना... अरे अरे मास्टर जी फेर अंग्रेजी.... ओह मल्लब फर्जी के कई प्रकार होते हैं लेकिन प्रमुख रूप से तीन आजकल ज्यादा विख्यात हैं.. 1) फर्जी डिग्री 2) फर्जी कसमे वादे और जो सबसे महत्वपूर्ण है 3) फर्जी फेसबुक, ट्वीटर आईडी। मास्टर जी आप जैसे पढ़ाते हो, हमको लगता है आपकी #डिग्री 370 डिग्री की है। क्या मतलब.... मास्टर जी मेरा मतलब आप ज्यादा पढ़े लिखे लगते हो। धन्यवाद धन्यवाद... लेकिन 360 से ज्यादा डिग्री तो होती नहीं रे? मास्टर जी मैं 380 की डिग्री बनाकर दिखाउंगा आपको, आप ऐसे ही पढ़ाते रहे हमें तो, क्यों पूजा? जी मास्टर जी, मैं भी 400। हमको टोपी तो नहीं पहना रहे तुमलोग... ! खैर बच्चों अब हम आगे बढ़ेंगे, #नेक्स्ट फर्जी कसमे वादे... मेरी बीवी आज मुझसे कहती है कि शादी से पहले तो बड़े बड़े वादे करते थे मास्टर। तेरे लिए ये लाउंगा, वो लाउंगा, मंगल ग्रह चलेंगे तो वहां से बुध में कूदेंगे, बृहस्पति में नहाएंगे...फलां फलां! ओए मास्टररररररर... इधर देख न, नजर मिला के बात कर, मैं वही तीन साल पहले वाली तुम्हारी जान #बसंती हूं। फिर आपने क्या कहा मास्टर जी....? तुम बहुत सवाल करते हो बुद्धुवा, मैं बताए रहा हूं न..! जी मास्टर जी। तो बच्चों मेरे पास कोई जवाब नहीं उनके सवालों का... बस फर्जी थोबड़ा उठाकर, हल्की झुकी झुकी नजर से हिम्मत करके कहे देता हूं... कभी मछुआरे को देखा है मछली फंसाने के बाद भी मछली को चारा खिलाते हुए...! नहीं न, तो! मैं बेवकूफ हूं? बात करती है... वही बसंती हूं मैं... तो मैं कहां कह रहा तू ऐश्वर्या राय हो गई है.....वाह वाह वाह मास्टर जी क्या जवाब मारा है। मास्टर जी आप भी फर्जी.....! अरे चुप, हम असली हैं। ये #दहीवाड़ा भी तो कल जी न्यूज में दिखाए रहा था मास्टर जी? अरररररे वो दहीवाड़ा नहीं, फर्जीवाड़ा है बुद्धू। हां तो अगला है फर्जी #आईडी... इ का होता है मास्टर जी। एगो लड़की रोज फेसबुक पर हमरे फोटो में कमेंट करती है। कहती है वावव हैंडसम। हमर दिल खुश हो गया देख के इतनी सुंदर छोरी का कमेंट देख के। उ भी काला कपाटा हमको हैंडसम बोली....! मन गदगद। रोज मेसेज में बात करती है पर फोन नंबर भी दिया लेकिन कॉल नहीं करती। पता नहीं कहां होगी, एक बार मिले तो सही। मास्टर जी, मास्टर जी आप #ऐंजल स्वीट #जस्मीन की बात तो नहीं कर रहे? मास्टर जी का पारा चढ़ा... दे उठा पटक, चप्पल पे चप्पल, ससुरा हमको टोपी पहनाता है...क्लास खत्म... हमाम में सब फर्जी हैं...

ऑटोवाले भाई.. बेवफायार की राज तो बता

ऑटोवाला भाई क्या कहना चाहता है...? इसका राज क्या है? राज की गहराई को मापने के लिए मैंने मज़बूत रस्सी फेंकी। पहले तो पूछते ही वो शर्मा गया और 30 सेकंड तक मुस्कुराता रहा जैसे कि उसे जिंदगी का कोई हसीन वाला पल याद आ गया हो। शर्माते हुए मैंने भी फिर पूछा...कुछ तो बात है भाई...! फिर वो ऑटो स्टार्ट किया और खुलने लगा परत दर परत उस बेवफा यार का राज........ बचपन में बनारस के एक गांव के स्कूल में एक लड़की को बेइम्तिहां मोहब्बत करता था शिवराज। टूट कर चाहता था। नाम क्या था भाई मैडम का...! नीलू... नीलू नाम था दोस्त। बहुत सुंदर नाम है भाई, नाम इतना सुंदर तो चेहरा कितना हसीन होगा भाई...! वो मोबाइल निकाला और स्क्रीन दिखाया... अच्छा तो ये हैं मैम नीलू। बहुत सुंदर है भाई। अच्छा आगे बता भाई... हुआ क्या? आठवीं क्लास से दसवीं तक दोनों छिप छिपकर मिलते रहे, कसमे वादे निभाने के वादे करते रहे। सात जन्मों तक साथ जीने मरने की कसमे खाने लगे। प्यार का परवान चढ़ता गया। मिलते जुलते दसवीं पास कर गए। फिर नीलू के घर उसकी शादी की बात होने लगी। नीलू ने शिवराज से शादी करने की बात घरवालों को बताई। घरवालों ने नीलू की यह बात सुनकर कि वह अपनी पसंद के किसी लड़के से शादी करना चाहती है...जमकर डांट फटकार लगाई और शिवराज को भुलाकर एक दूसरे लड़के के साथ शादी के लिए तैयार हो जाने की चेतावनी दी। नीलू ने वो गुनाह कर दिया था जो हम जैसे दिलवालों के लिए बेगुनाह थी लेकिन छोटे कस्बे और गांव की समाज के लिए घोर अपराध। इन सबके बीच अब नीलू के लिए जिंदगी का सबसे कठिन फैसला लेने का वक्त था। घरवालों की सुने या अपने दिल की। दिमाग की सुने तो दिल घायल हो जाएगा और दिल की सुने तो परिवार। इधर या उधर, चुनना एक को ही है, लेकिन दिल दोनों को मना करने की इजाजत नहीं देता। घरवालों से समाज जुड़ा है तो मोहब्बत से खुशियां। जाएं तो जाएं किधर? परिवार-समाज को ठुकराकर हम दिलवालों का दिल तो नीलू जीत सकती थी लेकिन घरवालों से सदा के लिए हार जाती। इन सबके बीच रिश्ते की तराजू में घरवालों का वजन ज्यादा हुआ और नीलू ने अपने मोहब्बत, अपनी खुशी की कुर्बानी देकर शिवराज से दूर हो जाने का फैसला किया। तब से शिवराज के दिल में उसके लिए संजोई वफाई बेवफाई में बदल गई। शिवराज को ये मजबूरी बेवफ़ाई लगी और वह उसके आस पास बनारस में भी नहीं रह सका। एक साल से वह नोएडा में ऑटो चलाता है और दिल में छपे दाग को ऑटे के पीछे उतारकर याद करता रहता है। उधर नीलू की शादी दूसरे लड़के के साथ कर दी गई है, खुश है या नहीं, कोई मायने नहीं रखता। लेकिन शिवराज की नजर में वो मजबूर नीलू हमेशा के लिए बेवफा यार बन गई है।

रोहतक: प्लेटनेम से हटते सरनेम, मोड़ों पर उठती सुरक्षा दीवारें

किसी उपजाऊ भूमि में अम्लीय वर्षा हो जाए तो उसकी पुरानी गुणवत्ता वापस आने में लंबा समय लग जाता है। चाहे उस मिट्टी में जितनी खाद और गोबर डाल दें, उसमें घुला लवण खाद की शक्ति को मार देता है। यूं कहें कि कुछ दाग इतने भद्दे होते हैं कि काफी रगड़ने के बाद वो धुल तो जाते हैं लेकिन रह जाती हैं रगड़ की निशान। आरक्षण आंदोलन के दौरान फैले उपद्रव औऱ हिंसा की आग में कुछ इस तरह के दाग कई शांतिप्रिय शहरों में लगे हैं। दाग तो धुल जाएंगे लेकिन रह जाएंगी वही रगड़ की निशान। आंदोलन के दौरान उपजे जातिगत हिंसा के बीज ने अब अंकुर लेना शुरू कर दिया है। इसका प्रभाव कई जिलों के सेक्टरों और कॉलोनियों में देखे जा सकते हैं। कई घरों के लोगों ने नेमप्लेट से अपना सरनेम हटा दिया है। कई कॉलोनियों में लोगों ने असुरक्षा महसूस करते हुए दीवारें और बड़े गेट लगाने शुरू कर दिए हैं। सेक्टर के ही कुछ लोग बताते हैं कि उन्हें वह खौफनाक मंजर याद है जब आंदोलन के भड़कने के बाद कुछ शरारती तत्वों द्वारा लोगों के सरनेम पूछ पूछकर भी निशाना बनाया जा रहा था। सेक्टर का ही एक निवासी इसका जिक्र करते हुए बताते हैं कि हिंसा के दौरान प्रशासन नाम की चीज गायब हो जाने से उपद्रवियों द्वारा जिस तरह लोगों को और उनकी दुकानों प्रतिष्ठानों को चुन चुनकर उनके सामने तहस नहस कर दिया गया है, आज भी उनके मन में भय है कि आने वाले समय कब क्या हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। 
 
भविष्य में यह अंकुर बनेगा पौधा फिर लग सकते हैं पेड़
आंदोलन के बाद जिस प्रकार जाट और गैर जाट बिरादरी के लोगों ने अलग अलग एकता का प्रदर्शन किया है, निश्चित रूप से यह भाईचारे के लिए खतरे की घंटी है। उपद्रव के दौरान हुई आगजनी के शिकार डी पार्क के एक प्रतिष्ठित व्यापारी ने बताया कि दुकानों को चुन चुनकर निशाना बनाया गया है। उनका कहना है कि उनकी दुकान के आस पास की दुकानों को क्षति नहीं पहुंचाई गई। वे जवाब मांग रहे हैं कि ऐसा सिर्फ उनके साथ क्यों हुआ। वहीं एमडीयू के सोशियोलोजी विभाग के एक विशेषज्ञ कहते हैं कि अभी जो बीज बोए गए हैं इसका असर आने वाले कुछ दिनों में खुले तौर पर दिख सकता है। यह भविष्य के लिए बहुत खतरनाक संदेश है। इसे कैसे मना किया जा सकता है कि अब इसका असर स्कूल, कॉलेज, नौकरी आदि में भी देखने को न मिले। 

कुछ भी नहीं था, अब गली, मोहल्लों में लगने लगे हैं सुरक्षा गेट
आज से ठीक एक महीने पहले तक सब कुछ शांत, बेखौफ माहौल था। आरक्षण आंदोलन के भड़कने के बाद मचे उपद्रव ने सबको हिला कर रख दिया है। लोगों में भय का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि जहां कुछ दिन पहले तक खुली गलियां, कॉलोनियां हुआ करती थीं अब उनमें इंट्री के लिए दरवाजे और दीवारें उठने लगी हैं। रोहतक के सेक्टर एक, दो, डी पार्क स्थित कॉलोनियों में सुरक्षा गेट लगते देखे जा सकते हैं। वहीं सोनीपत के गोहाना में भी कस्बे वालों ने चंदा कर कॉलोनियों के मुख्य द्वार पर सुरक्षा के लिए बड़े बड़े दरवाजे लगाने शुरू कर दिए हैं। 

दुनिया ने देखा खौफनाक शहर, कौन आना चाहेगा रोहतक
सेक्टर की दयावती ने बताया कि पूरे रोहतक को प्रशासान ने भगवान भरोसे छोड़ दिया। खुले आम लूटपाट की जा रही थी, आग लगाए जा रहे थे, घर फूंका जा रहा था। ये सब पूरी दुनिया देख रही थी। ये देखने के बाद कौन आना चाहेगा रोहतक। उनके अनुसार सेक्टर में होने वाली दो शादियां सिर्फ इसिलए टूट गईं कि लड़का रोहतक का है। जो दाग लगे हैं उसे धो पाना बहुत मुश्किल है। 

कुछ यूं दिखा भय...
हरियाणा सरकार के न्यायपालिका विभाग में कार्यरत एक उच्च अधिकारी ने आंदोलन के दौरान उपजे जातिगत हिंसा का असर काफी खतरनाक बताते हुए एक लाइव उदाहरण दिया। उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था में लगे एक सुरक्षाकर्मी को हमारे सामने उनका नाम पूछा। जिसके जवाब में उन्होंने सिर्फ बलवीर बताया। दोबारा पूरा नाम पूछे जाने पर उन्होंने बलबीर कुमार बताया। तीसरी बार फिर टाइटल पूछे जाने पर उन्होंने चौहान बताया। उसके मन में पूरा नाम पूछे जाने का भय साफ दिख रहा था।

मैं रोहतक हूं ! मुझे लौटा दो, मेरे प्यारे दिन

मैं रोहतक हूं। 10 लाख बच्चे हैं मेरे। मेरा कोई सरनेम  नहीं, कोई टाइटल नहीं। किसी बिरादरी का नहीं मैं, न किसी जाति या रंग से पहचान है मेरी। बस जाना जाता हूं तो एक चमकते शहर की उभरती कहानी और आपसी भाईचारे के तौर पर। समय समय पर मेरे दामन में कुछ दाग लगे पर सबकुछ भुलाकर, सबकुछ धोकर मैंने विकास और अनेकता में एकता की राह को नहीं छोड़ा। 14 फरवरी को वेलेंटाइन-डे के दिन मैं भी मोहब्बत के रंग में जमकर रंगा। 15 फरवरी तक फरीदाबाद में लगे विश्व विख्यात 30वें सूरजकुंड इंटरनेशनल क्राफ्ट मेले का हिस्सा भी था मैं। मेरे पराठा स्टाल में भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों से आए सैलानियों ने रोहतकी पराठे का स्वाद भी लिया। सबकुछ सही सलामत चल रहा था। मेरे विकास की बातें हो रही थी। स्मार्ट सिटी में शामिल होने की इच्छा थी ही, स्मार्टनेस और बढ़ाने की जद्दोजहद कर रहा था मैं। लेकिन जाने किसकी नजर लगी मुझे। 19-20 फरवरी को जाट आरक्षण आंदोलन की चिंगारी ऐसी भड़की कि सैकड़ों फायर ब्रिगेड की गाड़ियां, पुलिस प्रशासन और सरकार भी उसकी लपटें बुझा न सकीं। उपद्रव का दावानल सब कुछ राख कर गया। चारों ओर कुछ दिख रहा था तो बस मेरी बर्बादी के नजारे और सुनाई दे रहे थे तो सिर्फ मेरी तबाही के किस्से। आग चाहे अब बुझ गई हो लेकिन मेरे बच्चों की आंखों में आंसू व दिलों में दहशत खत्म होने का नाम नहीं ले रही है विकास के सारे रंग धुल गए हैं। काले रंग के धुएं से मेरा चेहरा पुत गया है। मेरी स्मार्टनेस खत्म हो गई है। मेरे दामन में ऐसे दाग लगे जो कभी धुल भी पाएंगे, कह नहीं सकता। रोम जल रहा था तब उसका शासक नीरो बांसुरी बजा रहा था। यही तो हुआ मेरे साथ। सब देखते रहे, मैं लुटता रहा। मेरे बच्चे मरते रहे, पिटते रहे, मैं कराहता रहा। मेरी कराहने की आवाज दुनिया सुन रही थी लेकिन बचाने वाला भी हमें लुटता देखता रहा। भरोसा करता तो किस पर। सब कुछ ऊपर वाले पर छोड़ दिया। जिस खूबसूरती को बनाने में मैंने सालों लगा दिए, पल भर में उसको उजड़ा देख मैं रो रहा हूं। विकास का गरूर आंसुओं में धुल गया। कल तक मेरी सुंदरता देख लोग मुस्कुराते थे, आज मेरी बदसूरती देखकर तरस खा रहे हैं। हवा का ये कैसा झोंका था जो सबकुछ उड़ा ले गया। मैं संभल नहीं पा रहा हूं। कहां गई मेरी शान ओ शौकत, आरएन सिनेमा, मॉल, चमकते वाहनों के शोरूम, मेडिकल मोड़ की पहचान, मेरी धड़कन डी-पार्क और मेडिकल चौक की विशाल दुकानें और सबसे बढ़कर मेरे बच्चों के बीच वो भाईचारा। कहां है वो रौनक जब रात को भी चमचमाती दिल्ली बाईपास की सड़कों के बीच बैखौफ घूमते नजर आते थे मेरे बच्चे। मेरे कलेजे में लगाई आग अब तक धधक रही है। मैं रो रहा हूं। मुझे मेरी वो शांति और मेरा स्मार्टनेस लौटा दो। मेरे बच्चों में वही भाईचारा बना दो। ऐ खौफ तू चला जा, मेरे बच्चों को फिर वही बैखौफ अकेला घूमने की आजादी दे दो। मुझे लौटा दो मेरे वो प्यारे प्यारे दिन…