किसी उपजाऊ भूमि में अम्लीय वर्षा हो जाए तो उसकी पुरानी
गुणवत्ता वापस आने में लंबा समय लग जाता है। चाहे उस मिट्टी में जितनी खाद और गोबर
डाल दें, उसमें घुला लवण खाद की शक्ति को मार देता है। यूं कहें कि कुछ दाग इतने
भद्दे होते हैं कि काफी रगड़ने के बाद वो धुल तो जाते हैं लेकिन रह जाती हैं रगड़
की निशान। आरक्षण आंदोलन के दौरान फैले उपद्रव औऱ हिंसा की आग में कुछ इस तरह के
दाग कई शांतिप्रिय शहरों में लगे हैं। दाग तो धुल जाएंगे लेकिन रह जाएंगी वही रगड़
की निशान। आंदोलन के दौरान उपजे जातिगत हिंसा के बीज ने अब अंकुर लेना शुरू कर
दिया है। इसका प्रभाव कई जिलों के सेक्टरों और कॉलोनियों में देखे जा सकते हैं। कई
घरों के लोगों ने नेमप्लेट से अपना सरनेम हटा दिया है। कई कॉलोनियों में लोगों ने
असुरक्षा महसूस करते हुए दीवारें और बड़े गेट लगाने शुरू कर दिए हैं। सेक्टर के ही
कुछ लोग बताते हैं कि उन्हें वह खौफनाक मंजर याद है जब आंदोलन के भड़कने के बाद कुछ
शरारती तत्वों द्वारा लोगों के सरनेम पूछ पूछकर भी निशाना बनाया जा रहा था। सेक्टर
का ही एक निवासी इसका जिक्र करते हुए बताते हैं कि हिंसा के दौरान प्रशासन नाम की
चीज गायब हो जाने से उपद्रवियों द्वारा जिस तरह लोगों को और उनकी दुकानों
प्रतिष्ठानों को चुन चुनकर उनके सामने तहस नहस कर दिया गया है, आज भी उनके मन में भय
है कि आने वाले समय कब क्या हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता।
भविष्य में यह अंकुर बनेगा पौधा फिर लग
सकते हैं पेड़
आंदोलन के बाद जिस प्रकार जाट और गैर जाट बिरादरी के लोगों ने अलग अलग
एकता का प्रदर्शन किया है, निश्चित रूप से यह भाईचारे के लिए खतरे की घंटी है। उपद्रव
के दौरान हुई आगजनी के शिकार डी पार्क के एक प्रतिष्ठित व्यापारी ने बताया कि
दुकानों को चुन चुनकर निशाना बनाया गया है। उनका कहना है कि उनकी दुकान के आस पास
की दुकानों को क्षति नहीं पहुंचाई गई। वे जवाब मांग रहे हैं कि ऐसा सिर्फ उनके साथ
क्यों हुआ। वहीं एमडीयू के सोशियोलोजी विभाग के एक विशेषज्ञ कहते हैं कि अभी जो
बीज बोए गए हैं इसका असर आने वाले कुछ दिनों में खुले तौर पर दिख सकता है। यह
भविष्य के लिए बहुत खतरनाक संदेश है। इसे कैसे मना किया जा सकता है कि अब इसका असर
स्कूल, कॉलेज, नौकरी आदि में भी देखने को न मिले।
कुछ भी नहीं था, अब गली, मोहल्लों में
लगने लगे हैं सुरक्षा गेट
आज से ठीक एक महीने पहले तक सब कुछ शांत, बेखौफ माहौल था। आरक्षण
आंदोलन के भड़कने के बाद मचे उपद्रव ने सबको हिला कर रख दिया है। लोगों में भय का
अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि जहां कुछ दिन पहले तक खुली गलियां, कॉलोनियां
हुआ करती थीं अब उनमें इंट्री के लिए दरवाजे और दीवारें उठने लगी हैं। रोहतक के
सेक्टर एक, दो, डी पार्क स्थित कॉलोनियों में सुरक्षा गेट लगते देखे जा सकते हैं।
वहीं सोनीपत के गोहाना में भी कस्बे वालों ने चंदा कर कॉलोनियों के मुख्य द्वार पर
सुरक्षा के लिए बड़े बड़े दरवाजे लगाने शुरू कर दिए हैं।
दुनिया ने देखा खौफनाक शहर, कौन आना
चाहेगा रोहतक
सेक्टर की दयावती ने बताया कि पूरे रोहतक को प्रशासान ने भगवान भरोसे
छोड़ दिया। खुले आम लूटपाट की जा रही थी, आग लगाए जा रहे थे, घर फूंका जा रहा था।
ये सब पूरी दुनिया देख रही थी। ये देखने के बाद कौन आना चाहेगा रोहतक। उनके अनुसार
सेक्टर में होने वाली दो शादियां सिर्फ इसिलए टूट गईं कि लड़का रोहतक का है। जो
दाग लगे हैं उसे धो पाना बहुत मुश्किल है।
कुछ यूं दिखा भय...
हरियाणा सरकार के न्यायपालिका विभाग में कार्यरत एक उच्च अधिकारी ने
आंदोलन के दौरान उपजे जातिगत हिंसा का असर काफी खतरनाक बताते हुए एक लाइव उदाहरण
दिया। उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था में लगे एक सुरक्षाकर्मी को हमारे सामने उनका नाम
पूछा। जिसके जवाब में उन्होंने सिर्फ बलवीर बताया। दोबारा पूरा नाम पूछे जाने पर
उन्होंने बलबीर कुमार बताया। तीसरी बार फिर टाइटल पूछे जाने पर उन्होंने चौहान
बताया। उसके मन में पूरा नाम पूछे जाने का भय साफ दिख रहा था।
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