मेरे गांव वाले मकान में एक कुआं है। पानी इतना शुद्ध और मीठा कि उसे किसी
फिटलरी या एक्वागार्ड की जरूरत नहीं। लाइट है, फ्रीज भी है लेकिन आप गरमी
में कहीं से थके हारे आए तो यकीन मानिए कुएं के पानी से जितना सुकून मिलता
है वो आरओ और फ्रीज के पानी से नहीं। कभी गांव में दो माह गुजारिए, बूढ़े
बुजुर्गों की प्राकृतिक बातें, प्राकृतिक विचार और काम के प्राकृतिक तरीके
आप सुनेंगे और गौर करेंगे तो आपको लगेगा आज के इन चाइनिज मशीनों का काम
बेकार है। वो तो अब हम जैसे नवयुवकों(खोखले) की सलाह पर हमारे माता पिता भी
मेडिसीन ही लेने लगे हैं वरना बिना मेडिसीन के आज भी मेरे गांव में लगभग
सौ साल के कई युवा जैसे लोग ठीक ठाक चल फिर लेते हैं। क्यों, क्योंकि
उन्होंने हमेशा प्राकृतिक चीजों का आहरण किया और इलाज भी प्राकृतिक जड़ी
बूटियों से ही की। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मेरे पिताजी के पिताजी की
माताजी का निधन नौ साल पहले हुआ, 104 साल में। अक्सर कहती थी मुझे सत्तू
खाओ, नीम के पत्ते की सब्जी खाओ, जंगली फल खाओ। जहां तक संभव होता, मैं
खाने की कोशिश करता, आज शायद उसका ही फल है कि जिंदगी में आज तक मैंने एक
भी इंजेक्शन लिया हो या होस्पीटलाइज हुआ, मुझे तो याद नहीं। खैर बात अब
मुद्दे की। बात 2004 की है। सातवीं क्लास में था। मेरी 104 साल वाली दादी
अम्मा ने कहा कुएं का पानी मीठा और शुद्ध बनाए रखना है तो इसमें दो चार
मछलियां और मेढ़क छोड़ दो। मैंने बताए अनुसार बाजार से 100 छोटी मछलियां
मस्त फुदकने वाली ले आया और आहिस्ता आहिस्ता कुएं में सभी को छोड़ दिया।
पानी बिल्कुल साफ था। हर चार-पांच दिन में कुएं के पास जाकर मछलियों को
देखता और कभी कभी उनके खाने का चारा भी डाल देता। दिन बीतते गए, मछलियां
बड़ी होती गई। अब मछलियां इतनी बड़ी हो गई थी कि उन्हें आप बाहर से ही
स्पष्ट देख सकते थे, उनकी हरकतों पर नजर रख सकते थे। कुछ महीने बाद एक ताऊ
के मगध में एक आइडिया आया। कुछ मछलियों को पकड़कर खाने के उनके विचार में
मैंने भी हामी भर दी। फिर क्या, खाने के लिए पकड़ने चला गया। पानी बिलकुल
साफ था। मैं हैरान रह गया देखकर। कुएं में केवल 30 मछलियां बची थी। मुझे
सबसे पहले पड़ोसी पर शक हुआ। खूब गाली गलौज कर दी उसके साथ। पंचायत हुई, उस
पर जुर्माना भी लगा दिया। एक दिन बस यूं ही बैठा था कुएं के पास। पानी में
तेज खलबली मची। धूप तेज थी, पानी साफ था। पानी के अंदर का नजारा स्पष्ट
दिख रहा था। पैरों तले जमीन खिसक गई देखकर। एक हल्की बड़ी वाली मछली छोटी
मछलियों को दौड़ा रही थी। मैं यह सोचकर देखता रहा कि वह बच्चों के साथ खेल
रही है। लेकिन अगले ही पल बड़ी मछली ने एक के गले पर वार किया और तुरंत
निगल गई। मुझे समझ आ गया कि क्यों कम हो रही थी मछलियां। मैंने कभी सपने
में भी नहीं सोचा था कि ऐसा भी हो सकता है क्योंकि जो मछलियां हमने कुएं
में छोड़ी थी वो सभी एक ही प्रजाति(रेहू) की थी। हमने अलग अलग
प्रजाति(हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई) की मछलियों को इसी डर से नहीं छोड़ा
था कुएं में ताकि वे इंसानों की तरह मार काट न मचाए। लेकिन एक समाज में
सिर्फ एक ही प्रजाति की मछलियां होने के बावजूद ये मार काट क्यों हुई। अब
तक सवाल है मेरे मन में... क्या कोई मुल्क सिर्फ मुस्लिम राष्ट्र या हिंदू
राष्ट्र बन जाने से समस्याएं खत्म हो जाएंगी? क्या फिर कोई दंगे या
लड़ाइयां नहीं होंगी? क्या एक धार्मिक देश बन जाने से अमन और चैन कायम हो
जाएगा? कोई मुस्लिम और हिदूवादी कट्टर नेता इसकी गारंटी दे सकता है? मैंने
फौरन उस पड़ोसी को बुलाया जिसके साथ मैंने गाली गलौज की थी। उसकी सहायता से
ही बड़ी वाली मछली को तुरंत पकड़वाकर शाम का खाना तैयार किया। मेरा पड़ोसी
दूसरे कास्ट का था, इसलिए उस पर शक पहले हुआ था। आज वह बहुत अच्छा दोस्त
है मेरा। जात पात पर न बांटें समाज को। मिलकर रहें तभी तक अमन, चैन और
खुशहाली है। टूट गए अगर हम तो पड़ोसी देश घात लगाए बैठा है। अपने आप से
लड़ते रह जाएंगे हम इतिहास के पन्नों में...
Friday, October 30, 2015
Saturday, October 24, 2015
जो पिछले साल जलाया था उस रावण का क्या हुआ
चारों ओर विजयादशमी
की धूम है। हर पांच सौ मीटर की दूरी पर रामलीला का जीवंत मंचन कर लोगों को सच्चाई
और नेकी की राह पर चलने के संदेश दिए जा रहे हैं। अच्छी बात है, दिया जाना चाहिए।
पूरा देश रावण रूपि दानव पर शक्ति की देवी मां दुर्गा की बुराई पर अच्छाई की जीत
के जश्न में सराबोर है। पर अफसोस कि हम भारतवासी जितनी सच्चाई से उत्साह और उमंग
के साथ त्यौहारों के नशे में डूबना पसंद करते हैं उतनी ही लचरता से इन त्यौहारों
से मिलने वाले संदेश पर आत्मचिंतन कर पाते हैं। राष्ट्रीय पर्व हो या धार्मिक त्यौहार
हम 121 करोड़ हिन्दुस्तानी दुनिया को यह संदेश देने में कोई कसर नहीं छोड़ते कि
अनेकता में एकता देखना हो तो हिन्दुस्तान को देखो। अलग बात है कि परिवार में ही भाई-
भाई में भाई-चारा न हो और दूसरे तले में रहने वाली एक पत्रकार की पत्नी अपने
पड़ोसी इंजीनियर की गाड़ी देख ताने मारकर अपने पति को बरगला रही हो फिरभी भारत
एकता में अनेकता वाला देश है। माना कि सामाजिक समस्याओं को खत्म होने में समय लगता
है पर यहां तो रफ्तार 180 की स्पीड से बढ़ रही है, अपराधों की, धार्मिक लड़ाइयों
की और एक दूसरे के प्रति घृणा की। पिछले नौ दिनों से मां देवी दुर्गा की नौ
अवतारों की पूजा अर्चना जोरों से चली। हैरत की बात है आज दशमी के दिन ही अखबारों
में उसी देवी दुर्गा की प्रतीक एक महिला के साथ दुराचार कर मानवता को तार तार करने
वाली खबर सुर्खियों में है। महीने का कोई ऐसा दिन नहीं जब अखबारों में कन्या भ्रूण
हत्या, यौन-शोषण, दहेज प्रताड़ना जैसी दिल को दहला देने वाली घटनाएं न छपती हो। क्या
दिखावे भर की पूजा-संकल्प और रावण को जलाकर समाज से समस्याओं को खत्म किया जा सकता
है? समाज और अपने अंदर की रावणता को जब तक जलाकर
भष्म नहीं कर देते ये 60 और 70 फूट के पुतलों को जलाने से बुराई खत्म हो ही नहीं
सकती सिवाय प्रदूषण फैलाने के। पिछले कई दशकों से यह लीला चली आ रही है। फिर आज हम
समाज से बुराइयों का ग्राफ खत्म तो नहीं पर घटने की उम्मीद तो कर ही सकते थे। लंका
का रावण तो नहीं पर कौन है जो हर दूसरे घंटे भारतीय महिलाओं का हरण कर रहा, कहां
का रावण है जो एक समाज को दूसरे समाज से खूनी हमले करवाने को आतूर हुए जा रहा है।
जो भी हो पर है उस रावण से भी खतरनाक जो इंसानों के खून का प्यासा बना घूमता फिर
रहा है। जहां मौका मिलता सीता का हरण करने से नहीं चूकता। हम हर दशहरे पर हजारों
रावण मार चुके हैं पर अफसोस कि हमारे अंदर मौजूद रावण जिंदा ही नहीं वायरस की तरह
फैल रहा है। एक बार फिर दावे के साथ कहता हूं कि हम हिंदूस्तानी हैं, हम रावण दहन
के दिन तो सच्चाई से अपनी बुराइयों को जला देते हैं, पर अगले दो दिनों में यह दानव
हमारे अंदर समा जाता है। फिर कहते हैं क्या करें आखिर दिल तो हिंदूस्तानी ही है। मिलकर
प्रण लें कि रावण को जलाने के साथ अपनी बुराइयों को भी जलाकर हमेशा के लिए भष्म कर
देंगे और लोगों का भी करवाएंगे। वरना मां देवी दुर्गा की अराधना होती रहेगी, रावण
जलता रहेगा, पटाखे फटते रहेंगे, पुतला 60 से 600 फुट तक का हो जाएगा और इधर
देवियों पर अत्याचार भी पुतले की लंबाई की तुलना में बढ़ता रहेगा। Friday, October 23, 2015
छात्रावास है या कारावास... ठीक है पर
बात 2002 की है। लगभग दस वर्ष का था मैं। उधर गुजरात में दंगा भड़क रहा था
इधर छात्रावास(कारावास से कम नहीं) में कैद मेरे अंदर यहां से आजादी पाने
के लिए संघर्ष की चिंगारी सुलग रही थी। उस वक्त होस्टल की जिंदगी किसी सजा
से कम नहीं होती थी। मोहब्बतें के गुरुकुल की कड़ाई भी कम थी जितनी सख्ती
से अनुशासन का पालना और दंड देने का प्रावधान धनबाद स्थित हमारे रवि महतो
होस्टल में था। सबसे नामी गिरामी और स्ट्रीक्ट स्कूलों में एक था ये। मालिक
थे जलेश्वर महतो, झारखंड सरकार के तत्कालीन जल मंत्री। सर्दी हो या गर्मी
या बरसात, अहले सुबह 4 बजे भले ही मुर्गा बांगना भूल जाए पर गार्ड जी का
घंटा बजना कभी बंद नहीं हुआ। चाहे रात भर न सो पाओ, एक मिनट भी लेट उठे तो
लगाओ तीन किमी की दौड़। दौड़ की सजा तो अलग, भैंसे की तरह धुलाई छठी की दूध
याद दिला देती थी। याद है वो दिन जब स्कूल में इतनी सख्ती से डरकर दो
छात्र देर रात होस्टल की सुरक्षा व्यवस्था को धता बताकर फरार हो गए थे।
पूरे स्कूल प्रबंधन में हड़कंप ऐसे मच गया मानो तिहाड़ जेल से दो कुख्यात
आतंकवादी फरार हो गए हों। आनन फानन बैठक हुई, छात्रों को पकड़ने के लिए
टीमें बनाई गई। टीम में उसैन बोल्ट जैसे धावकों को शामिल किया गया। दावा
है, ऐसी टीमें भारत सरकार नहीं बना सकती। सभी हैरान थे कि दोनों भगोड़े
छात्रों को घर पहुंचने से पहले ही दबोचकर वापस होस्टल ले आया गया। महामहिम
उप प्रिंसिपल के सामने दोनों की पेशी हुई। एक बात और छात्रों को दंड देने
के लिए विशेष तौर पर कलकत्ता से बेंत यानी छड़ी मंगाई जाती थी। दोनों की
इतनी बेरहमी से पिटाई हुई, अगले दिन एक के हाथ पर प्लास्टर चढ़ाना पड़ा।
अलग बात है कि परिवार वाले भी बच्चों को सुधार के नाम पर पड़ने वाली पिटाई
का उस वक़्त विरोध नहीं करते थे। कई बार मैं भी शिकार हुआ, एक सर पर
आपत्तिजनक टिप्पणी करने के कारण मेरी भी इसकदर धुलाई हुई कि तीन दिन तक
तबीयत खराब रही। हाल ही एक खबर आई कि एक छात्र की पिटाई करने पर एक स्कूल
टीचर पर 5000 का जुर्माना लगाया गया तो मेरा एक क्लासमेट बोला हमारे टाइम
में ऐसा होता तो आज हम भी कम से कम लखपति जरूर होते। एक लड़के को चिकन
पाॅक्स क्या हुआ सभी को घर जाने का जैसे बहाना मिल गया। मैंने भी नाखून से
कुरेदकर हाथ में निशान बना दिया, फिर क्या छुट्टी के नाम भर से आग बबुला
होने वाले इंचार्ज सर ने खुद घर पहुंचा दिया मुझे। घर जाने के दौरान रास्ते
भर में जो खुशी का एहसास हो रहा था, कसम से बता नहीं सकता। दाग तो दाग ही
होते हैं, न चाहते हुए भी पांच दिन में मिट गए, घरवालों ने फिर छोड़ आया उस
पिंजड़े में। लेकिन मैं दोस्तों से एक जबरदस्त आइडिया लेकर पहुंचा इस बार
होस्टल। होस्टल के प्रांगण में एक पीपल का पेड़ था। स्कूल के टीचर किसी से
डरे या नहीं पीपल में मौजूद भूत से बहुत डरते थे। प्लान के मुताबिक एक टीचर
को आते देख मैंने जानबूझकर पीपल पर थूक दिया। टीचर मेरी ये हरकत देख मानो
पागल हो गया। ये क्या कर दिया तुमने, पेड़ पर बाबा रहते हैं, तुमने थूक
दिया वहां, पानी लाकर धो यहां वरना... टीचर ने वरना क्या बोला मेरी उल्टी
सीधी हरकतें शुरू। पूरे स्कूल में बात आग की तरह फैल गई कि मुकेश महतो पागल
हो गया। फिर क्या प्रबंधन की गाड़ी मुझे घर छोड़ आई। दो दिन बाद घर में
ठीक हो जाता, फिर घरवाले जबरदस्ती होस्टल छोड़ आते। फिर वही हरकतें शुरू,
ये सिलसिला तीन बार चला। मुश्किल से घर जा पाता, घरवाले हैं कि समझते नहीं,
दोबारा वहीं छोड़ आते। होस्टल में सुबह सुबह सभी उठे ही थे कि मैंने जोर
जोर से हंसना शुरू कर दिया। सभी समझ गए भूत सवार हो गया। डर के मारे कमरे
से सभी भागने लगे। कुछ देर बाद चार अन्य शिक्षकों के साथ महामहिम प्रिंसिपल
आए और पास कुर्सी लगाकर बैठ गए। मैं हंस रहा था, सर ने बड़े प्यार से अपना
चेहरा आगे करते हुए कहा... बेटा मुकेश, बाबू क्या हुआ। मैं एक बार और जोर
से हंसा और जोर की थप्पड़ प्रिंसिपल के गाल पर दे मारी। हड़बड़ा कर वो
कुर्सी से गिर पड़े। फिर क्या प्रिंसिपल के साथ सभी शिक्षक मेरे पास से
भागे। फिर गाड़ी आई और मुझे घर छोड़ने के लिए निकल पड़ी। इसबार प्रिंसिपल
ने एक खत भी घरवालों के नाम भेजा था। लिखा था इसका नामांकन कहीं और करा
दिया जाए। आज भी घर जाता हूं तो प्रिंसिपल से मिलने जरूर जाता हूं, बहुत
मानते हैं। एक आइडिया जो बदल दे आपकी दुनिया...खुशियां देना चाहता हूं गुड्डी को, वरना मौत को तो यूं गले लगा लें
लेट नाइट आफिस से आने के कारण सुबह देर तक आंखें नहीं खुली। सो रहा था मैं,
कोई मेरे कमरे के बाहर बालकनी में बड़बडा़ रहा था। आंखें खुली, ध्यान से
सुनने लगा। वो बड़े प्यार से फोन पर बातें कर रहा था, हंसते हुए... मिस यू
गुड्डी, बहुत जल्द आ रहा हूं, काम कर रहा हूं। आज पैसे मिलेंगे, तुम्हारे
लिए एक अच्छी साड़ी लाउंगा फिर घूमने चलेंगे। बात कर रहा था वो, नींद मेरी
उड़ गई। गेट खोला तो हड़बड़ाते हुए उसने फोन रख दिया। हमारे मकान मालिक ने
मकान की रंगाई पुताई के लिए आदमी लगाया हुआ है। उससे
पूछा मैंने, क्या बात है बोस, बहुत खुश लग रहे हो। काफी पूछने पर शर्माते
हुए उसने बताया, पिछले साल उसने अपनी गर्लफ्रेंड से शादी की है। उसके घर
वालों ने उसे घर से बेदखल कर दिया है क्योंकि लड़की मुस्लिम फैमिली से है।
दोनों ने सबकुछ छोड़ कर अलग नई दुनिया बसा ली है। गांव तो जन्म भूमि है।
उसे आज भी सताती है घर, परिवार, गांव की याद। वह वहां जाने को आतुर होता है
और जाता भी है लेकिन हर बार गांव वालों से बुरी तरह पीट कर आता है। शायद
घरवालों को भी ऐतराज नहीं है अब लेकिन मोहल्ले और समाज वालों ने इन दोनों
जोड़ों के लिए गांव के बाहर एलओसी की लकीरें खींच दी है। ऐसा नहीं है कि
इसने सुरक्षा की गुहार नहीं लगाई, प्रशासन के ठेकेदारों ने भी कम जुल्म
नहीं ढहाया। समाज के ठेकेदारों के बढ़ते जुल्मों से परेशान होकर दोनों ने
जिंदगी की पटरी को खत्म करने की भी ठानी। रेलवे ट्रैक पर भी गए, साथ जीने
मरने की कसमे वादे खाकर कसकर हाथ पकड़ दोनों पटरी पर लेट भी गए। मौत के
सदमे ने आखिरी पल जिंदगी की ओर करवट बदल दी और दोनों मौत के मुंह में जाते
जाते बच गए। लौट आई जिंदगी लेकिन सदमे में चली गई गुड्डी की आवाज़। अब वो
सिर्फ मैसेज मैसेज में ही बात कर पाती है। लेकिन लड़के को विश्वास है कि वो
अपने मोहब्बत की आवाज़ के दम पर लड़की की पुकार वापस लाएगा एक दिन। इसलिए
वह हर दो घंटे में उसे फोन कर दिल की आवाज़ सुनाता है। मैंने कहा निडर होकर
लौट जाओ गांव। उसका जवाब कलेजे को हिला देने वाला था, लौट तो जाउं मुकेश
भाई लेकिन कल हम दोनों को मारकर पेड़ पर लटका दिया जाएगा और आप मीडिया वाले
2 मिनट चिल्ला दोगे कि प्रेमी जोड़े ने कर ली आत्महत्या। हम जीना चाहते
हैं, गुड्डी को हर खुशियां देना चाहते हैं वरना मौत को तो हम यूं गले लगा
लें। मोहब्बत के रंग से बेहतर कोई रंग देखा नहीं आजतक मैंने, फिर भी न जाने
क्यों लोग नफरत के रंगों में जीया करते हैं। जिंदा है आज भी ऐसा हीर रांझा
वाला प्यार। वरना 'मौसम की तरह तुम बदल तो न जाओगे' के ठीक उलट यहां तो हर
मौसम में पति पत्नी बदल लिए जाते हैं। आपके प्यार और कुर्बान को सलाम।
अल्लाह हिफाजत करे दोनों की। है कोई बजरंगी भाईजान, जो सरहद पार नहीं बल्कि
अपने घर के द्वार के बाहर खड़े दो जिंदादिल लोगों की ही घर वापसी करा दे।अमित शाह से मैच जीतना मुश्किल ही नहीं, नामूमकिन है
राइट आर्म, ओवर द विकेट... घिंसी, पिटी वही पुरानी गेंद लेकर कप्तान अमित शाह
बालिंग ट्रैक पर तैयार। उधर क्रिज पर अकेले मजबूती के साथ डटे पड़े हैं
खतरनाक बल्लेबाज अल्लाह। फील्डिंग में मैदान के चारों ओर चौकन्ने खड़े 33
करोड़ देवी देवता खिलाड़ी। काफी रोमांचक मुकाबला। बल्लेबाज तैयार, अमित शाह
ने बल्लेबाज की आंखों में आंख मिलाकर तिरछी नजर से कौंधियाते हुए कुछ
इशारा किया। तेज कदमों के साथ गेंद फेंकने के लिए दौड़े अमित शाह, बल्लेबाज
अल्लाह हांफते हुए लेकिन काफ़ी मुस्तैद। और ये क्या, 180 की स्पीड
से फेंकी गेंद सीधे विकेट से जा टकराई। चौंधिया गए बल्लेबाज अल्लाह, शायद
वे शाह की गति भांप नहीं पाए, उन्हें गेंद दिखी नहीं। 33 लाख फील्डरों में
जोश, उत्साह.. हर हर मोदी से गूंज रहा पूरा स्टेडियम। जबरदस्त
वापसी। औरररररररर ये क्या, अचानक सब खामोश, 33 लाख खिलाड़ियों का खुला मुंह
और सर पर रखा हाथ। अंपायर(प्रणव मुखर्जी) ने कंधे के बल हाथ उठाकर किया नो
बाॅल का इशारा। खामोशी देख ऐसा लग रहा दो दिन से भूखे के मुंह से रोटी का
निवाला छीन लिया गया हो। अंपायर के निर्णय से लाल हो गए हैं मनोहर लाल
खट्टर। और ये क्या बल्लेबाज को गरियाते हुए जोशीले मनोहर। उधर खिलाड़ी
संगीत सोम और साक्षी महाराज ने भी खोया आपा। बल्लेबाज को जबरदस्ती घर वापसी
पैवेलियन की ओर जाने का इशारा करते हुए साक्षी और सोम। कुछ देर के लिए रोक
दिया गया है मैच। अंपायर ने अमित टीम को सख्त चेतावनी दी। ठंडा पानी और
कुरकुरे, साथ में मेंटोस भी लेकर खिलाड़ियों से मिलने खुद कोच मोहन भागवत
मैदान में पहुंच गए हैं। अमित शाह ने मनोहर, साक्षी और सोम को बुलाकर कुछ
समझाया साथ में हर हर मोदी का नारा सुनाकर हौसला बढ़ाया। साथी कमेंटेटर से
पूछते हैं, सुमित चौहान, आपको क्या लगता है, अमित शाह ने तीनों को क्या समझाया होगा? देखिए मुकेश,
काफी गरमा गरम मैच चल रहा है, इन सभी खिलाड़ियों ने विराट कोहली से काफी
कुछ सीखा है। कप्तान अमित शाह ने समझाया होगा कि पगले खुले आम ऐसे नहीं
लड़ते। अंपायर खड़े हैं यहां। बड़ी मुश्किल से क्लीन चिट मिलता है। वैसे भी
थर्ड अंपायर(सुप्रीम कोर्ट) के फैसले हमारे खिलाफ ही आ रहे हैं। तो थोड़ा
धैर्य से और हां ये लो मेंटोस खाओ और दिमाग की बत्ती जलाओ। मुख्य अतिथि
वाले बाॅक्स में बैठे जूनियर कोच नरेंद्र मोदी सारा वाकया देखकर मंद-मंद
मुस्कुराते हुए। और ठीक उनके दो सीट के पीछे बैठे 1992 विश्वकप विजेता टीम
के कप्तान लालकृष्ण आडवाणी जी मोदी की मुस्कान देखकर कुछ बड़बड़ाते हुए।
मोदी ने पानी और बाबा रामदेव की मैगी के साथ एक कागज की पुड़िया भी योगी
आदित्यनाथ के हाथों अमित शाह तक पहुंचाया। शाह ने पानी पी, मैगी खाया और
पुड़िया खोला... लिखा है, छोटे चुनाव चल रहा है न अभी, इतनी तेज गेंद नहीं
फेंकते। लाइन लेंग्थ पर ध्यान दो, बहुत नो बाॅल फेंक रहे। बीच में कुछ ओवर
हार्दिक पटेल से भी डलवा लिया करो....!ये जो "छोटू" होते हैं, वास्तव में अपने घर के बहुत "बड़े" होते हैं
ये जो "छोटू" होते हैं, चाय दुकानों या होटलों वगैरह में, वास्तव
में अपने घर के बहुत "बड़े" होते हैं... कल एक ढाबे पर डिनर करने गया, वहां एक
छोटा सा लड़का था, जो खाना खिला रहा था। सभी "ऎ छोटू" कह कर उसे बुला रहे थे।
नन्हा सा बच्चा, मानो भगवान ने उसे लोगों के आर्डर भर सुनने, सुनाने
के लिए ही पैदा किया। जिसे वह पिछले दो साल से ईमानदारी के साथ निभा रहा। मैंने
छोटू को "ऐ दोस्त" कहकर पास बुलाया। प्यारी सी मुस्कान लिये आया और बोला, जी साहब, क्या
खाओगे। मैंने कहा "भइया" बोल। आर्डर किया और खाने लगा। "दोस्त"
शब्द की ताकत देखिए, 20 लोग और उधर छोटू छोटू चिल्लाते रहते, मेरी एक पुकार से वह दौड़ा चला आता और
पूछता भइया और क्या लाऊं। छोटू के लिये मैं ग्राहक कम, मेहमान
ज्यादा बन चुका था। खाना अच्छा था ही दोस्त के प्यार ने और लजीज बना दिया। खाने के
बाद बिल दिया और 100 रू दोस्त को अलग से देते हुए कहा ये तुम रख लो। अखिर पूछ लिया कि क्या
करोगे इस पैसे का। मुस्कुराते हुए बोला, आज माँ बहुत खुश होगी, चप्पल ले
जाउंगा उनके लिए, 10 दिन से नंगे पैर ही जाती है साहब लोग के यहाँ बर्तन मांझने। बात सुन
मेरी आँखें भर आई। मैंने पूछा, घर पर कौन कौन है तो बोला माँ, मैं और छोटी बहन। पापा भगवान के पास चले
गए। मेरे पास अब कहने को कुछ नहीं था। कुछ पैसे और दिए और बोला, आज फल भी
ले जाना माँ के लिए। बहन के लिए भी ले लेना कुछ। मां पूछे कुछ, बता देना
पापा ने एक भइया को भेजा था। इतना सुन दोस्त मुझसे लिपट गया। मैंने वादा किया है, तेरे घर
जरूर आउंगा। इस दो पल की खुशी का एहसास कसम से ऐसा था, मानो
कितनी बड़ी महारथ हासिल कर ली है। करोड़ों रुपयों में नहीं मिलती वो खुशियां, जो दो पल
के मुफ्त की भाईचारे और मोहब्बत में हासिल हो जाती है मेरे दोस्त। वास्तव में वो
छोटू अपने घर का बहुत बड़ा निकला जो पढ़ाई की इस नादान उम्र में ही घर चला रहा। उन
असहाय करोड़ों बच्चों को सरकार से कोई उम्मीद नहीं है। वे बहुत खुश हैं रोज 50 रुपये भी
कमाकर। हर कोई "नसीब वाला" नहीं, जो चाय बेच कर प्रधानमंत्री और धीरुभाई बन
जाए। लोग 100 रुपये कमाने के बाद भी सुकुन के मामले में "अंबानी के बाप"
होते हैं। देखा है मैंने उस गांव की घर में खुशी की किलकारियों को, जिसमें
चार भाइयों का परिवार भाईचारे के साथ चार कमरे में रह रहा। कहने की बात है "27 मंजिला
एंटीला," जहां सिर्फ दो भाई नहीं रह सकते। किस सुकुन की बात करें, जहां
अरबों अकाउंट में हो, लेकिन एक ही कोख से पैदा हुए मुकेश अंबानी, अनिल का
नाम नहीं सुनना चाहते। राज ठाकरे, उद्धव का नाम नहीं सुन सकता। उफ्फ, ये दौलत की गर्मी। ऐसे ही न जाने कितने
छोटू होटल, ढाबों या चाय की दुकान पर काम करते मिल जाएंगे। हर दास्तान में एक
कहानी है। निवेदन है उन्हें नौकर की तरह न बुलाएं। थोड़ा प्यार से कहें। अच्छा
लगता है।
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