Friday, October 23, 2015

ये जो "छोटू" होते हैं, वास्तव में अपने घर के बहुत "बड़े" होते हैं

ये जो "छोटू" होते हैं, चाय दुकानों या होटलों वगैरह में, वास्तव में अपने घर के बहुत "बड़े" होते हैं... कल एक ढाबे पर डिनर करने गया, वहां एक छोटा सा लड़का था, जो खाना खिला रहा था। सभी "ऎ छोटू" कह कर उसे बुला रहे थे। नन्हा सा बच्चा, मानो भगवान ने उसे लोगों के आर्डर भर सुनने, सुनाने के लिए ही पैदा किया। जिसे वह पिछले दो साल से ईमानदारी के साथ निभा रहा। मैंने छोटू को "ऐ दोस्त" कहकर पास बुलाया। प्यारी सी मुस्कान लिये आया और बोला, जी साहब, क्या खाओगे। मैंने कहा "भइया" बोल। आर्डर किया और खाने लगा। "दोस्त" शब्द की ताकत देखिए, 20 लोग और उधर छोटू छोटू चिल्लाते रहते, मेरी एक पुकार से वह दौड़ा चला आता और पूछता भइया और क्या लाऊं। छोटू के लिये मैं ग्राहक कम, मेहमान ज्यादा बन चुका था। खाना अच्छा था ही दोस्त के प्यार ने और लजीज बना दिया। खाने के बाद बिल दिया और 100 रू दोस्त को अलग से देते हुए कहा ये तुम रख लो। अखिर पूछ लिया कि क्या करोगे इस पैसे का। मुस्कुराते हुए बोला, आज माँ बहुत खुश होगी, चप्पल ले जाउंगा उनके लिए, 10 दिन से नंगे पैर ही जाती है साहब लोग के यहाँ बर्तन मांझने। बात सुन मेरी आँखें भर आई। मैंने पूछा, घर पर कौन कौन है तो बोला माँ, मैं और छोटी बहन। पापा भगवान के पास चले गए। मेरे पास अब कहने को कुछ नहीं था। कुछ पैसे और दिए और बोला, आज फल भी ले जाना माँ के लिए। बहन के लिए भी ले लेना कुछ। मां पूछे कुछ, बता देना पापा ने एक भइया को भेजा था। इतना सुन दोस्त मुझसे लिपट गया। मैंने वादा किया है, तेरे घर जरूर आउंगा। इस दो पल की खुशी का एहसास कसम से ऐसा था, मानो कितनी बड़ी महारथ हासिल कर ली है। करोड़ों रुपयों में नहीं मिलती वो खुशियां, जो दो पल के मुफ्त की भाईचारे और मोहब्बत में हासिल हो जाती है मेरे दोस्त। वास्तव में वो छोटू अपने घर का बहुत बड़ा निकला जो पढ़ाई की इस नादान उम्र में ही घर चला रहा। उन असहाय करोड़ों बच्चों को सरकार से कोई उम्मीद नहीं है। वे बहुत खुश हैं रोज 50 रुपये भी कमाकर। हर कोई "नसीब वाला" नहीं, जो चाय बेच कर प्रधानमंत्री और धीरुभाई बन जाए। लोग 100 रुपये कमाने के बाद भी सुकुन के मामले में "अंबानी के बाप" होते हैं। देखा है मैंने उस गांव की घर में खुशी की किलकारियों को, जिसमें चार भाइयों का परिवार भाईचारे के साथ चार कमरे में रह रहा। कहने की बात है "27 मंजिला एंटीला," जहां सिर्फ दो भाई नहीं रह सकते। किस सुकुन की बात करें, जहां अरबों अकाउंट में हो, लेकिन एक ही कोख से पैदा हुए मुकेश अंबानी, अनिल का नाम नहीं सुनना चाहते। राज ठाकरे, उद्धव का नाम नहीं सुन सकता। उफ्फ, ये दौलत की गर्मी। ऐसे ही न जाने कितने छोटू होटल, ढाबों या चाय की दुकान पर काम करते मिल जाएंगे। हर दास्तान में एक कहानी है। निवेदन है उन्हें नौकर की तरह न बुलाएं। थोड़ा प्यार से कहें। अच्छा लगता है।



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