Friday, October 30, 2015

कहानी नहीं हकीकत है, मन में कराहते कठोर सवाल हैं....

मेरे गांव वाले मकान में एक कुआं है। पानी इतना शुद्ध और मीठा कि उसे किसी फिटलरी या एक्वागार्ड की जरूरत नहीं। लाइट है, फ्रीज भी है लेकिन आप गरमी में कहीं से थके हारे आए तो यकीन मानिए कुएं के पानी से जितना सुकून मिलता है वो आरओ और फ्रीज के पानी से नहीं। कभी गांव में दो माह गुजारिए, बूढ़े बुजुर्गों की प्राकृतिक बातें, प्राकृतिक विचार और काम के प्राकृतिक तरीके आप सुनेंगे और गौर करेंगे तो आपको लगेगा आज के इन चाइनिज मशीनों का काम बेकार है। वो तो अब हम जैसे नवयुवकों(खोखले) की सलाह पर हमारे माता पिता भी मेडिसीन ही लेने लगे हैं वरना बिना मेडिसीन के आज भी मेरे गांव में लगभग सौ साल के कई युवा जैसे लोग ठीक ठाक चल फिर लेते हैं। क्यों, क्योंकि उन्होंने हमेशा प्राकृतिक चीजों का आहरण किया और इलाज भी प्राकृतिक जड़ी बूटियों से ही की। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मेरे पिताजी के पिताजी की माताजी का निधन नौ साल पहले हुआ, 104 साल में। अक्सर कहती थी मुझे सत्तू खाओ, नीम के पत्ते की सब्जी खाओ, जंगली फल खाओ। जहां तक संभव होता, मैं खाने की कोशिश करता, आज शायद उसका ही फल है कि जिंदगी में आज तक मैंने एक भी इंजेक्शन लिया हो या होस्पीटलाइज हुआ, मुझे तो याद नहीं। खैर बात अब मुद्दे की। बात 2004 की है। सातवीं क्लास में था। मेरी 104 साल वाली दादी अम्मा ने कहा कुएं का पानी मीठा और शुद्ध बनाए रखना है तो इसमें दो चार मछलियां और मेढ़क छोड़ दो। मैंने बताए अनुसार बाजार से 100 छोटी मछलियां मस्त फुदकने वाली ले आया और आहिस्ता आहिस्ता कुएं में सभी को छोड़ दिया। पानी बिल्कुल साफ था। हर चार-पांच दिन में कुएं के पास जाकर मछलियों को देखता और कभी कभी उनके खाने का चारा भी डाल देता। दिन बीतते गए, मछलियां बड़ी होती गई। अब मछलियां इतनी बड़ी हो गई थी कि उन्हें आप बाहर से ही स्पष्ट देख सकते थे, उनकी हरकतों पर नजर रख सकते थे। कुछ महीने बाद एक ताऊ के मगध में एक आइडिया आया। कुछ मछलियों को पकड़कर खाने के उनके विचार में मैंने भी हामी भर दी। फिर क्या, खाने के लिए पकड़ने चला गया। पानी बिलकुल साफ था। मैं हैरान रह गया देखकर। कुएं में केवल 30 मछलियां बची थी। मुझे सबसे पहले पड़ोसी पर शक हुआ। खूब गाली गलौज कर दी उसके साथ। पंचायत हुई, उस पर जुर्माना भी लगा दिया। एक दिन बस यूं ही बैठा था कुएं के पास। पानी में तेज खलबली मची। धूप तेज थी, पानी साफ था। पानी के अंदर का नजारा स्पष्ट दिख रहा था। पैरों तले जमीन खिसक गई देखकर। एक हल्की बड़ी वाली मछली छोटी मछलियों को दौड़ा रही थी। मैं यह सोचकर देखता रहा कि वह बच्चों के साथ खेल रही है। लेकिन अगले ही पल बड़ी मछली ने एक के गले पर वार किया और तुरंत निगल गई। मुझे समझ आ गया कि क्यों कम हो रही थी मछलियां। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा भी हो सकता है क्योंकि जो मछलियां हमने कुएं में छोड़ी थी वो सभी एक ही प्रजाति(रेहू) की थी। हमने अलग अलग प्रजाति(हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई) की मछलियों को इसी डर से नहीं छोड़ा था कुएं में ताकि वे इंसानों की तरह मार काट न मचाए। लेकिन एक समाज में सिर्फ एक ही प्रजाति की मछलियां होने के बावजूद ये मार काट क्यों हुई। अब तक सवाल है मेरे मन में... क्या कोई मुल्क सिर्फ मुस्लिम राष्ट्र या हिंदू राष्ट्र बन जाने से समस्याएं खत्म हो जाएंगी? क्या फिर कोई दंगे या लड़ाइयां नहीं होंगी? क्या एक धार्मिक देश बन जाने से अमन और चैन कायम हो जाएगा? कोई मुस्लिम और हिदूवादी कट्टर नेता इसकी गारंटी दे सकता है? मैंने फौरन उस पड़ोसी को बुलाया जिसके साथ मैंने गाली गलौज की थी। उसकी सहायता से ही बड़ी वाली मछली को तुरंत पकड़वाकर शाम का खाना तैयार किया। मेरा पड़ोसी दूसरे कास्ट का था, इसलिए उस पर शक पहले हुआ था। आज वह बहुत अच्छा दोस्त है मेरा। जात पात पर न बांटें समाज को। मिलकर रहें तभी तक अमन, चैन और खुशहाली है। टूट गए अगर हम तो पड़ोसी देश घात लगाए बैठा है। अपने आप से लड़ते रह जाएंगे हम इतिहास के पन्नों में...

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