बात 2002 की है। लगभग दस वर्ष का था मैं। उधर गुजरात में दंगा भड़क रहा था
इधर छात्रावास(कारावास से कम नहीं) में कैद मेरे अंदर यहां से आजादी पाने
के लिए संघर्ष की चिंगारी सुलग रही थी। उस वक्त होस्टल की जिंदगी किसी सजा
से कम नहीं होती थी। मोहब्बतें के गुरुकुल की कड़ाई भी कम थी जितनी सख्ती
से अनुशासन का पालना और दंड देने का प्रावधान धनबाद स्थित हमारे रवि महतो
होस्टल में था। सबसे नामी गिरामी और स्ट्रीक्ट स्कूलों में एक था ये। मालिक
थे जलेश्वर महतो, झारखंड सरकार के तत्कालीन जल मंत्री। सर्दी हो या गर्मी
या बरसात, अहले सुबह 4 बजे भले ही मुर्गा बांगना भूल जाए पर गार्ड जी का
घंटा बजना कभी बंद नहीं हुआ। चाहे रात भर न सो पाओ, एक मिनट भी लेट उठे तो
लगाओ तीन किमी की दौड़। दौड़ की सजा तो अलग, भैंसे की तरह धुलाई छठी की दूध
याद दिला देती थी। याद है वो दिन जब स्कूल में इतनी सख्ती से डरकर दो
छात्र देर रात होस्टल की सुरक्षा व्यवस्था को धता बताकर फरार हो गए थे।
पूरे स्कूल प्रबंधन में हड़कंप ऐसे मच गया मानो तिहाड़ जेल से दो कुख्यात
आतंकवादी फरार हो गए हों। आनन फानन बैठक हुई, छात्रों को पकड़ने के लिए
टीमें बनाई गई। टीम में उसैन बोल्ट जैसे धावकों को शामिल किया गया। दावा
है, ऐसी टीमें भारत सरकार नहीं बना सकती। सभी हैरान थे कि दोनों भगोड़े
छात्रों को घर पहुंचने से पहले ही दबोचकर वापस होस्टल ले आया गया। महामहिम
उप प्रिंसिपल के सामने दोनों की पेशी हुई। एक बात और छात्रों को दंड देने
के लिए विशेष तौर पर कलकत्ता से बेंत यानी छड़ी मंगाई जाती थी। दोनों की
इतनी बेरहमी से पिटाई हुई, अगले दिन एक के हाथ पर प्लास्टर चढ़ाना पड़ा।
अलग बात है कि परिवार वाले भी बच्चों को सुधार के नाम पर पड़ने वाली पिटाई
का उस वक़्त विरोध नहीं करते थे। कई बार मैं भी शिकार हुआ, एक सर पर
आपत्तिजनक टिप्पणी करने के कारण मेरी भी इसकदर धुलाई हुई कि तीन दिन तक
तबीयत खराब रही। हाल ही एक खबर आई कि एक छात्र की पिटाई करने पर एक स्कूल
टीचर पर 5000 का जुर्माना लगाया गया तो मेरा एक क्लासमेट बोला हमारे टाइम
में ऐसा होता तो आज हम भी कम से कम लखपति जरूर होते। एक लड़के को चिकन
पाॅक्स क्या हुआ सभी को घर जाने का जैसे बहाना मिल गया। मैंने भी नाखून से
कुरेदकर हाथ में निशान बना दिया, फिर क्या छुट्टी के नाम भर से आग बबुला
होने वाले इंचार्ज सर ने खुद घर पहुंचा दिया मुझे। घर जाने के दौरान रास्ते
भर में जो खुशी का एहसास हो रहा था, कसम से बता नहीं सकता। दाग तो दाग ही
होते हैं, न चाहते हुए भी पांच दिन में मिट गए, घरवालों ने फिर छोड़ आया उस
पिंजड़े में। लेकिन मैं दोस्तों से एक जबरदस्त आइडिया लेकर पहुंचा इस बार
होस्टल। होस्टल के प्रांगण में एक पीपल का पेड़ था। स्कूल के टीचर किसी से
डरे या नहीं पीपल में मौजूद भूत से बहुत डरते थे। प्लान के मुताबिक एक टीचर
को आते देख मैंने जानबूझकर पीपल पर थूक दिया। टीचर मेरी ये हरकत देख मानो
पागल हो गया। ये क्या कर दिया तुमने, पेड़ पर बाबा रहते हैं, तुमने थूक
दिया वहां, पानी लाकर धो यहां वरना... टीचर ने वरना क्या बोला मेरी उल्टी
सीधी हरकतें शुरू। पूरे स्कूल में बात आग की तरह फैल गई कि मुकेश महतो पागल
हो गया। फिर क्या प्रबंधन की गाड़ी मुझे घर छोड़ आई। दो दिन बाद घर में
ठीक हो जाता, फिर घरवाले जबरदस्ती होस्टल छोड़ आते। फिर वही हरकतें शुरू,
ये सिलसिला तीन बार चला। मुश्किल से घर जा पाता, घरवाले हैं कि समझते नहीं,
दोबारा वहीं छोड़ आते। होस्टल में सुबह सुबह सभी उठे ही थे कि मैंने जोर
जोर से हंसना शुरू कर दिया। सभी समझ गए भूत सवार हो गया। डर के मारे कमरे
से सभी भागने लगे। कुछ देर बाद चार अन्य शिक्षकों के साथ महामहिम प्रिंसिपल
आए और पास कुर्सी लगाकर बैठ गए। मैं हंस रहा था, सर ने बड़े प्यार से अपना
चेहरा आगे करते हुए कहा... बेटा मुकेश, बाबू क्या हुआ। मैं एक बार और जोर
से हंसा और जोर की थप्पड़ प्रिंसिपल के गाल पर दे मारी। हड़बड़ा कर वो
कुर्सी से गिर पड़े। फिर क्या प्रिंसिपल के साथ सभी शिक्षक मेरे पास से
भागे। फिर गाड़ी आई और मुझे घर छोड़ने के लिए निकल पड़ी। इसबार प्रिंसिपल
ने एक खत भी घरवालों के नाम भेजा था। लिखा था इसका नामांकन कहीं और करा
दिया जाए। आज भी घर जाता हूं तो प्रिंसिपल से मिलने जरूर जाता हूं, बहुत
मानते हैं। एक आइडिया जो बदल दे आपकी दुनिया...Friday, October 23, 2015
छात्रावास है या कारावास... ठीक है पर
बात 2002 की है। लगभग दस वर्ष का था मैं। उधर गुजरात में दंगा भड़क रहा था
इधर छात्रावास(कारावास से कम नहीं) में कैद मेरे अंदर यहां से आजादी पाने
के लिए संघर्ष की चिंगारी सुलग रही थी। उस वक्त होस्टल की जिंदगी किसी सजा
से कम नहीं होती थी। मोहब्बतें के गुरुकुल की कड़ाई भी कम थी जितनी सख्ती
से अनुशासन का पालना और दंड देने का प्रावधान धनबाद स्थित हमारे रवि महतो
होस्टल में था। सबसे नामी गिरामी और स्ट्रीक्ट स्कूलों में एक था ये। मालिक
थे जलेश्वर महतो, झारखंड सरकार के तत्कालीन जल मंत्री। सर्दी हो या गर्मी
या बरसात, अहले सुबह 4 बजे भले ही मुर्गा बांगना भूल जाए पर गार्ड जी का
घंटा बजना कभी बंद नहीं हुआ। चाहे रात भर न सो पाओ, एक मिनट भी लेट उठे तो
लगाओ तीन किमी की दौड़। दौड़ की सजा तो अलग, भैंसे की तरह धुलाई छठी की दूध
याद दिला देती थी। याद है वो दिन जब स्कूल में इतनी सख्ती से डरकर दो
छात्र देर रात होस्टल की सुरक्षा व्यवस्था को धता बताकर फरार हो गए थे।
पूरे स्कूल प्रबंधन में हड़कंप ऐसे मच गया मानो तिहाड़ जेल से दो कुख्यात
आतंकवादी फरार हो गए हों। आनन फानन बैठक हुई, छात्रों को पकड़ने के लिए
टीमें बनाई गई। टीम में उसैन बोल्ट जैसे धावकों को शामिल किया गया। दावा
है, ऐसी टीमें भारत सरकार नहीं बना सकती। सभी हैरान थे कि दोनों भगोड़े
छात्रों को घर पहुंचने से पहले ही दबोचकर वापस होस्टल ले आया गया। महामहिम
उप प्रिंसिपल के सामने दोनों की पेशी हुई। एक बात और छात्रों को दंड देने
के लिए विशेष तौर पर कलकत्ता से बेंत यानी छड़ी मंगाई जाती थी। दोनों की
इतनी बेरहमी से पिटाई हुई, अगले दिन एक के हाथ पर प्लास्टर चढ़ाना पड़ा।
अलग बात है कि परिवार वाले भी बच्चों को सुधार के नाम पर पड़ने वाली पिटाई
का उस वक़्त विरोध नहीं करते थे। कई बार मैं भी शिकार हुआ, एक सर पर
आपत्तिजनक टिप्पणी करने के कारण मेरी भी इसकदर धुलाई हुई कि तीन दिन तक
तबीयत खराब रही। हाल ही एक खबर आई कि एक छात्र की पिटाई करने पर एक स्कूल
टीचर पर 5000 का जुर्माना लगाया गया तो मेरा एक क्लासमेट बोला हमारे टाइम
में ऐसा होता तो आज हम भी कम से कम लखपति जरूर होते। एक लड़के को चिकन
पाॅक्स क्या हुआ सभी को घर जाने का जैसे बहाना मिल गया। मैंने भी नाखून से
कुरेदकर हाथ में निशान बना दिया, फिर क्या छुट्टी के नाम भर से आग बबुला
होने वाले इंचार्ज सर ने खुद घर पहुंचा दिया मुझे। घर जाने के दौरान रास्ते
भर में जो खुशी का एहसास हो रहा था, कसम से बता नहीं सकता। दाग तो दाग ही
होते हैं, न चाहते हुए भी पांच दिन में मिट गए, घरवालों ने फिर छोड़ आया उस
पिंजड़े में। लेकिन मैं दोस्तों से एक जबरदस्त आइडिया लेकर पहुंचा इस बार
होस्टल। होस्टल के प्रांगण में एक पीपल का पेड़ था। स्कूल के टीचर किसी से
डरे या नहीं पीपल में मौजूद भूत से बहुत डरते थे। प्लान के मुताबिक एक टीचर
को आते देख मैंने जानबूझकर पीपल पर थूक दिया। टीचर मेरी ये हरकत देख मानो
पागल हो गया। ये क्या कर दिया तुमने, पेड़ पर बाबा रहते हैं, तुमने थूक
दिया वहां, पानी लाकर धो यहां वरना... टीचर ने वरना क्या बोला मेरी उल्टी
सीधी हरकतें शुरू। पूरे स्कूल में बात आग की तरह फैल गई कि मुकेश महतो पागल
हो गया। फिर क्या प्रबंधन की गाड़ी मुझे घर छोड़ आई। दो दिन बाद घर में
ठीक हो जाता, फिर घरवाले जबरदस्ती होस्टल छोड़ आते। फिर वही हरकतें शुरू,
ये सिलसिला तीन बार चला। मुश्किल से घर जा पाता, घरवाले हैं कि समझते नहीं,
दोबारा वहीं छोड़ आते। होस्टल में सुबह सुबह सभी उठे ही थे कि मैंने जोर
जोर से हंसना शुरू कर दिया। सभी समझ गए भूत सवार हो गया। डर के मारे कमरे
से सभी भागने लगे। कुछ देर बाद चार अन्य शिक्षकों के साथ महामहिम प्रिंसिपल
आए और पास कुर्सी लगाकर बैठ गए। मैं हंस रहा था, सर ने बड़े प्यार से अपना
चेहरा आगे करते हुए कहा... बेटा मुकेश, बाबू क्या हुआ। मैं एक बार और जोर
से हंसा और जोर की थप्पड़ प्रिंसिपल के गाल पर दे मारी। हड़बड़ा कर वो
कुर्सी से गिर पड़े। फिर क्या प्रिंसिपल के साथ सभी शिक्षक मेरे पास से
भागे। फिर गाड़ी आई और मुझे घर छोड़ने के लिए निकल पड़ी। इसबार प्रिंसिपल
ने एक खत भी घरवालों के नाम भेजा था। लिखा था इसका नामांकन कहीं और करा
दिया जाए। आज भी घर जाता हूं तो प्रिंसिपल से मिलने जरूर जाता हूं, बहुत
मानते हैं। एक आइडिया जो बदल दे आपकी दुनिया...
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