चारों ओर विजयादशमी
की धूम है। हर पांच सौ मीटर की दूरी पर रामलीला का जीवंत मंचन कर लोगों को सच्चाई
और नेकी की राह पर चलने के संदेश दिए जा रहे हैं। अच्छी बात है, दिया जाना चाहिए।
पूरा देश रावण रूपि दानव पर शक्ति की देवी मां दुर्गा की बुराई पर अच्छाई की जीत
के जश्न में सराबोर है। पर अफसोस कि हम भारतवासी जितनी सच्चाई से उत्साह और उमंग
के साथ त्यौहारों के नशे में डूबना पसंद करते हैं उतनी ही लचरता से इन त्यौहारों
से मिलने वाले संदेश पर आत्मचिंतन कर पाते हैं। राष्ट्रीय पर्व हो या धार्मिक त्यौहार
हम 121 करोड़ हिन्दुस्तानी दुनिया को यह संदेश देने में कोई कसर नहीं छोड़ते कि
अनेकता में एकता देखना हो तो हिन्दुस्तान को देखो। अलग बात है कि परिवार में ही भाई-
भाई में भाई-चारा न हो और दूसरे तले में रहने वाली एक पत्रकार की पत्नी अपने
पड़ोसी इंजीनियर की गाड़ी देख ताने मारकर अपने पति को बरगला रही हो फिरभी भारत
एकता में अनेकता वाला देश है। माना कि सामाजिक समस्याओं को खत्म होने में समय लगता
है पर यहां तो रफ्तार 180 की स्पीड से बढ़ रही है, अपराधों की, धार्मिक लड़ाइयों
की और एक दूसरे के प्रति घृणा की। पिछले नौ दिनों से मां देवी दुर्गा की नौ
अवतारों की पूजा अर्चना जोरों से चली। हैरत की बात है आज दशमी के दिन ही अखबारों
में उसी देवी दुर्गा की प्रतीक एक महिला के साथ दुराचार कर मानवता को तार तार करने
वाली खबर सुर्खियों में है। महीने का कोई ऐसा दिन नहीं जब अखबारों में कन्या भ्रूण
हत्या, यौन-शोषण, दहेज प्रताड़ना जैसी दिल को दहला देने वाली घटनाएं न छपती हो। क्या
दिखावे भर की पूजा-संकल्प और रावण को जलाकर समाज से समस्याओं को खत्म किया जा सकता
है? समाज और अपने अंदर की रावणता को जब तक जलाकर
भष्म नहीं कर देते ये 60 और 70 फूट के पुतलों को जलाने से बुराई खत्म हो ही नहीं
सकती सिवाय प्रदूषण फैलाने के। पिछले कई दशकों से यह लीला चली आ रही है। फिर आज हम
समाज से बुराइयों का ग्राफ खत्म तो नहीं पर घटने की उम्मीद तो कर ही सकते थे। लंका
का रावण तो नहीं पर कौन है जो हर दूसरे घंटे भारतीय महिलाओं का हरण कर रहा, कहां
का रावण है जो एक समाज को दूसरे समाज से खूनी हमले करवाने को आतूर हुए जा रहा है।
जो भी हो पर है उस रावण से भी खतरनाक जो इंसानों के खून का प्यासा बना घूमता फिर
रहा है। जहां मौका मिलता सीता का हरण करने से नहीं चूकता। हम हर दशहरे पर हजारों
रावण मार चुके हैं पर अफसोस कि हमारे अंदर मौजूद रावण जिंदा ही नहीं वायरस की तरह
फैल रहा है। एक बार फिर दावे के साथ कहता हूं कि हम हिंदूस्तानी हैं, हम रावण दहन
के दिन तो सच्चाई से अपनी बुराइयों को जला देते हैं, पर अगले दो दिनों में यह दानव
हमारे अंदर समा जाता है। फिर कहते हैं क्या करें आखिर दिल तो हिंदूस्तानी ही है। मिलकर
प्रण लें कि रावण को जलाने के साथ अपनी बुराइयों को भी जलाकर हमेशा के लिए भष्म कर
देंगे और लोगों का भी करवाएंगे। वरना मां देवी दुर्गा की अराधना होती रहेगी, रावण
जलता रहेगा, पटाखे फटते रहेंगे, पुतला 60 से 600 फुट तक का हो जाएगा और इधर
देवियों पर अत्याचार भी पुतले की लंबाई की तुलना में बढ़ता रहेगा। Saturday, October 24, 2015
जो पिछले साल जलाया था उस रावण का क्या हुआ
चारों ओर विजयादशमी
की धूम है। हर पांच सौ मीटर की दूरी पर रामलीला का जीवंत मंचन कर लोगों को सच्चाई
और नेकी की राह पर चलने के संदेश दिए जा रहे हैं। अच्छी बात है, दिया जाना चाहिए।
पूरा देश रावण रूपि दानव पर शक्ति की देवी मां दुर्गा की बुराई पर अच्छाई की जीत
के जश्न में सराबोर है। पर अफसोस कि हम भारतवासी जितनी सच्चाई से उत्साह और उमंग
के साथ त्यौहारों के नशे में डूबना पसंद करते हैं उतनी ही लचरता से इन त्यौहारों
से मिलने वाले संदेश पर आत्मचिंतन कर पाते हैं। राष्ट्रीय पर्व हो या धार्मिक त्यौहार
हम 121 करोड़ हिन्दुस्तानी दुनिया को यह संदेश देने में कोई कसर नहीं छोड़ते कि
अनेकता में एकता देखना हो तो हिन्दुस्तान को देखो। अलग बात है कि परिवार में ही भाई-
भाई में भाई-चारा न हो और दूसरे तले में रहने वाली एक पत्रकार की पत्नी अपने
पड़ोसी इंजीनियर की गाड़ी देख ताने मारकर अपने पति को बरगला रही हो फिरभी भारत
एकता में अनेकता वाला देश है। माना कि सामाजिक समस्याओं को खत्म होने में समय लगता
है पर यहां तो रफ्तार 180 की स्पीड से बढ़ रही है, अपराधों की, धार्मिक लड़ाइयों
की और एक दूसरे के प्रति घृणा की। पिछले नौ दिनों से मां देवी दुर्गा की नौ
अवतारों की पूजा अर्चना जोरों से चली। हैरत की बात है आज दशमी के दिन ही अखबारों
में उसी देवी दुर्गा की प्रतीक एक महिला के साथ दुराचार कर मानवता को तार तार करने
वाली खबर सुर्खियों में है। महीने का कोई ऐसा दिन नहीं जब अखबारों में कन्या भ्रूण
हत्या, यौन-शोषण, दहेज प्रताड़ना जैसी दिल को दहला देने वाली घटनाएं न छपती हो। क्या
दिखावे भर की पूजा-संकल्प और रावण को जलाकर समाज से समस्याओं को खत्म किया जा सकता
है? समाज और अपने अंदर की रावणता को जब तक जलाकर
भष्म नहीं कर देते ये 60 और 70 फूट के पुतलों को जलाने से बुराई खत्म हो ही नहीं
सकती सिवाय प्रदूषण फैलाने के। पिछले कई दशकों से यह लीला चली आ रही है। फिर आज हम
समाज से बुराइयों का ग्राफ खत्म तो नहीं पर घटने की उम्मीद तो कर ही सकते थे। लंका
का रावण तो नहीं पर कौन है जो हर दूसरे घंटे भारतीय महिलाओं का हरण कर रहा, कहां
का रावण है जो एक समाज को दूसरे समाज से खूनी हमले करवाने को आतूर हुए जा रहा है।
जो भी हो पर है उस रावण से भी खतरनाक जो इंसानों के खून का प्यासा बना घूमता फिर
रहा है। जहां मौका मिलता सीता का हरण करने से नहीं चूकता। हम हर दशहरे पर हजारों
रावण मार चुके हैं पर अफसोस कि हमारे अंदर मौजूद रावण जिंदा ही नहीं वायरस की तरह
फैल रहा है। एक बार फिर दावे के साथ कहता हूं कि हम हिंदूस्तानी हैं, हम रावण दहन
के दिन तो सच्चाई से अपनी बुराइयों को जला देते हैं, पर अगले दो दिनों में यह दानव
हमारे अंदर समा जाता है। फिर कहते हैं क्या करें आखिर दिल तो हिंदूस्तानी ही है। मिलकर
प्रण लें कि रावण को जलाने के साथ अपनी बुराइयों को भी जलाकर हमेशा के लिए भष्म कर
देंगे और लोगों का भी करवाएंगे। वरना मां देवी दुर्गा की अराधना होती रहेगी, रावण
जलता रहेगा, पटाखे फटते रहेंगे, पुतला 60 से 600 फुट तक का हो जाएगा और इधर
देवियों पर अत्याचार भी पुतले की लंबाई की तुलना में बढ़ता रहेगा।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment