Friday, October 23, 2015

खुशियां देना चाहता हूं गुड्डी को, वरना मौत को तो यूं गले लगा लें

लेट नाइट आफिस से आने के कारण सुबह देर तक आंखें नहीं खुली। सो रहा था मैं, कोई मेरे कमरे के बाहर बालकनी में बड़बडा़ रहा था। आंखें खुली, ध्यान से सुनने लगा। वो बड़े प्यार से फोन पर बातें कर रहा था, हंसते हुए... मिस यू गुड्डी, बहुत जल्द आ रहा हूं, काम कर रहा हूं। आज पैसे मिलेंगे, तुम्हारे लिए एक अच्छी साड़ी लाउंगा फिर घूमने चलेंगे। बात कर रहा था वो, नींद मेरी उड़ गई। गेट खोला तो हड़बड़ाते हुए उसने फोन रख दिया। हमारे मकान मालिक ने मकान की रंगाई पुताई के लिए आदमी लगाया हुआ है। उससे पूछा मैंने, क्या बात है बोस, बहुत खुश लग रहे हो। काफी पूछने पर शर्माते हुए उसने बताया, पिछले साल उसने अपनी गर्लफ्रेंड से शादी की है। उसके घर वालों ने उसे घर से बेदखल कर दिया है क्योंकि लड़की मुस्लिम फैमिली से है। दोनों ने सबकुछ छोड़ कर अलग नई दुनिया बसा ली है। गांव तो जन्म भूमि है। उसे आज भी सताती है घर, परिवार, गांव की याद। वह वहां जाने को आतुर होता है और जाता भी है लेकिन हर बार गांव वालों से बुरी तरह पीट कर आता है। शायद घरवालों को भी ऐतराज नहीं है अब लेकिन मोहल्ले और समाज वालों ने इन दोनों जोड़ों के लिए गांव के बाहर एलओसी की लकीरें खींच दी है। ऐसा नहीं है कि इसने सुरक्षा की गुहार नहीं लगाई, प्रशासन के ठेकेदारों ने भी कम जुल्म नहीं ढहाया। समाज के ठेकेदारों के बढ़ते जुल्मों से परेशान होकर दोनों ने जिंदगी की पटरी को खत्म करने की भी ठानी। रेलवे ट्रैक पर भी गए, साथ जीने मरने की कसमे वादे खाकर कसकर हाथ पकड़ दोनों पटरी पर लेट भी गए। मौत के सदमे ने आखिरी पल जिंदगी की ओर करवट बदल दी और दोनों मौत के मुंह में जाते जाते बच गए। लौट आई जिंदगी लेकिन सदमे में चली गई गुड्डी की आवाज़। अब वो सिर्फ मैसेज मैसेज में ही बात कर पाती है। लेकिन लड़के को विश्वास है कि वो अपने मोहब्बत की आवाज़ के दम पर लड़की की पुकार वापस लाएगा एक दिन। इसलिए वह हर दो घंटे में उसे फोन कर दिल की आवाज़ सुनाता है। मैंने कहा निडर होकर लौट जाओ गांव। उसका जवाब कलेजे को हिला देने वाला था, लौट तो जाउं मुकेश भाई लेकिन कल हम दोनों को मारकर पेड़ पर लटका दिया जाएगा और आप मीडिया वाले 2 मिनट चिल्ला दोगे कि प्रेमी जोड़े ने कर ली आत्महत्या। हम जीना चाहते हैं, गुड्डी को हर खुशियां देना चाहते हैं वरना मौत को तो हम यूं गले लगा लें। मोहब्बत के रंग से बेहतर कोई रंग देखा नहीं आजतक मैंने, फिर भी न जाने क्यों लोग नफरत के रंगों में जीया करते हैं। जिंदा है आज भी ऐसा हीर रांझा वाला प्यार। वरना 'मौसम की तरह तुम बदल तो न जाओगे' के ठीक उलट यहां तो हर मौसम में पति पत्नी बदल लिए जाते हैं। आपके प्यार और कुर्बान को सलाम। अल्लाह हिफाजत करे दोनों की। है कोई बजरंगी भाईजान, जो सरहद पार नहीं बल्कि अपने घर के द्वार के बाहर खड़े दो जिंदादिल लोगों की ही घर वापसी करा दे।

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